एक इंजीनियरिंग छात्र और Hatri Technologies के संस्थापक के तौर पर, मैं तकनीक को सिर्फ कोड के नजरिए से नहीं, बल्कि उसे इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के नजरिए से भी देखता हूं। इसी वजह से सरकारी वेबसाइटों को इस्तेमाल करते हुए एक सवाल बार-बार सामने आता है—हमने सरकारी सेवाओं को डिजिटल तो कर दिया, लेकिन क्या हमने उन्हें सच में सरल बनाया है?
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में सरकारी सेवाओं को डिजिटल बनाने की दिशा में काफी प्रगति की है। पासपोर्ट, आयकर, प्रमाणपत्र, छात्रवृत्ति, सरकारी योजनाएं, चुनाव से जुड़ी सेवाएं और न जाने कितने काम अब इंटरनेट के जरिए किए जा सकते हैं।
यह बदलाव जरूरी भी था और स्वागत योग्य भी।
लेकिन एक आम नागरिक के लिए इन वेबसाइटों का इस्तेमाल करना कई बार खुद एक परीक्षा बन जाता है।
कभी वेबसाइट खुलने में परेशानी होती है, कभी मोबाइल पर पेज सही तरीके से दिखाई नहीं देता। कहीं इतने सारे विकल्प होते हैं कि यह समझना मुश्किल हो जाता है कि शुरुआत कहां से करें। कई जगह सरकारी भाषा इतनी जटिल होती है कि सामान्य व्यक्ति को यह समझने के लिए भी किसी दूसरे व्यक्ति की मदद लेनी पड़ती है कि उससे आखिर मांगा क्या जा रहा है।
और सबसे बड़ी समस्या तब होती है जब वेबसाइट किसी गलती के बाद सिर्फ इतना कहती है—“कुछ गलत हो गया”।
लेकिन क्या गलत हुआ?
कहां हुआ?
उसे कैसे ठीक किया जाए?
इन सवालों का जवाब अक्सर नागरिक को खुद ढूंढना पड़ता है।
यहीं से हमें डिजिटल सेवा और सिर्फ डिजिटल की गई सरकारी प्रक्रिया के बीच का अंतर समझना होगा।
पहले नागरिक सरकारी दफ्तर जाता था, फॉर्म ढूंढता था और किसी कर्मचारी से पूछता था कि आगे क्या करना है। अगर वही अनुभव अब वेबसाइट पर हो रहा है—बस कागज की जगह पीडीएफ है, कर्मचारी की जगह सहायता पृष्ठ है और लाइन की जगह प्रतीक्षा कर रही वेबसाइट—तो हमने प्रक्रिया को डिजिटल जरूर किया है, लेकिन उसे सरल नहीं बनाया।
लेकिन यहां सरकार की एक मुश्किल भी समझना जरूरी है।
भारत में सरकारी वेबसाइट बनाना किसी सामान्य वेबसाइट या मोबाइल ऐप को बनाने जैसा काम नहीं है।
हम 140 करोड़ से अधिक लोगों वाले देश की बात कर रहे हैं। यहां एक ही सरकारी सेवा का इस्तेमाल महानगर में रहने वाला तकनीकी रूप से सक्षम व्यक्ति भी करेगा और किसी छोटे गांव में रहने वाला ऐसा व्यक्ति भी, जिसने शायद पहली बार किसी सरकारी वेबसाइट का इस्तेमाल किया हो।
किसी के पास तेज इंटरनेट है, तो किसी के पास कमजोर नेटवर्क। किसी के पास नया स्मार्टफोन है, तो किसी के पास कई साल पुराना फोन। भारत में भाषाएं, शिक्षा, आय, डिजिटल समझ और तकनीकी सुविधाएं—सब कुछ बेहद अलग-अलग है।
इसके अलावा सरकारी वेबसाइटों को सिर्फ अच्छा दिखना नहीं होता। उन्हें करोड़ों रिकॉर्ड संभालने होते हैं, निजी जानकारी को सुरक्षित रखना होता है, अलग-अलग विभागों और पुराने सरकारी तंत्रों से जुड़ना होता है और कभी-कभी एक साथ लाखों लोगों का दबाव भी संभालना होता है।
इसलिए सिर्फ यह कहना कि “सरकारी वेबसाइट खराब है”, पूरी तस्वीर नहीं बताता।
कई बार समस्या खराब इंजीनियरिंग से ज्यादा जटिल सरकारी प्रक्रियाओं और पुराने तंत्र को डिजिटल दुनिया में लाने की होती है।
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि नागरिक को उस जटिलता का बोझ उठाना चाहिए।
अगर किसी नागरिक को आय प्रमाणपत्र बनवाना है, तो उसे यह जानने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि संबंधित विभाग की वेबसाइट के अंदर वह सुविधा किस मेनू में छिपी हुई है।
उसे बस यह बताना चाहिए—
“मुझे आय प्रमाणपत्र बनवाना है।”
और वेबसाइट को उसे आगे का रास्ता दिखाना चाहिए।
एक अच्छी सरकारी वेबसाइट नागरिक से यह उम्मीद नहीं कर सकती कि वह पहले सरकारी व्यवस्था को समझे और फिर उसका इस्तेमाल करे।
सिस्टम को नागरिक को समझना चाहिए।
यह बात खास तौर पर मोबाइल के मामले में महत्वपूर्ण है।
भारत में करोड़ों लोग कंप्यूटर की बजाय मोबाइल फोन के माध्यम से इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए सरकारी वेबसाइट का मोबाइल अनुभव कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि उसकी मूल आवश्यकता होनी चाहिए।
अगर वेबसाइट मोबाइल पर ठीक से नहीं चलती, छोटे अक्षरों में जानकारी देती है, बार-बार पेज बदलती है या दस्तावेज अपलोड करने में परेशानी पैदा करती है, तो डिजिटल सेवा का बड़ा हिस्सा वहीं खत्म हो जाता है।
फिर आती है भाषा की समस्या।
भारत सिर्फ हिंदी या अंग्रेजी बोलने वाला देश नहीं है। यहां दर्जनों प्रमुख भाषाएं और सैकड़ों बोलियां हैं। इसलिए केवल किसी वेबसाइट का दूसरी भाषा में अनुवाद कर देना पर्याप्त नहीं है।
भाषा ऐसी होनी चाहिए जिसे सामान्य नागरिक समझ सके।
सरकारी शब्दावली और कानूनी भाषा अपनी जगह जरूरी हो सकती है, लेकिन नागरिक को प्रक्रिया समझाने के लिए सरल भाषा का इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसी तरह वेबसाइट को नागरिक की गलती भी समझनी चाहिए।
अगर किसी ने गलत दस्तावेज अपलोड किया है तो केवल “अमान्य दस्तावेज” लिख देना पर्याप्त नहीं है।
उसे बताया जाना चाहिए कि दस्तावेज क्यों अमान्य है और सही दस्तावेज कौन-सा होगा।
अगर आवेदन अधूरा है तो यह साफ दिखाई देना चाहिए कि कौन-सी जानकारी बाकी है।
अगर आवेदन जमा हो गया है तो नागरिक को यह पता होना चाहिए कि अब आगे क्या होगा और उसे कितने समय तक इंतजार करना पड़ सकता है।
ये छोटी बातें लगती हैं, लेकिन करोड़ों लोगों के स्तर पर यही छोटी बातें बड़ी सुविधा या बड़ी परेशानी बन जाती हैं।
हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि सरकारी वेबसाइटों को बेहतर बनाना आसान काम नहीं है।
एक निजी कंपनी अपने कुछ हजार या कुछ लाख उपयोगकर्ताओं के लिए अपना उत्पाद बदल सकती है। सरकार को करोड़ों नागरिकों के लिए काम करने वाली व्यवस्था बनानी होती है। यहां सुरक्षा, गोपनीयता, कानूनी नियम, पुराने आंकड़े, अलग-अलग विभाग और राजनीतिक-प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी जुड़ी होती हैं।
इसलिए हमें सरकारी तकनीक की आलोचना करते समय यह समझना चाहिए कि चुनौती असाधारण रूप से बड़ी है।
लेकिन बड़ी चुनौती अच्छे परिणाम की जरूरत को खत्म नहीं करती।
भारत के पास आज दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल सार्वजनिक ढांचों में से कुछ हैं। अब अगला कदम केवल और सेवाओं को ऑनलाइन लाना नहीं होना चाहिए।
अगला कदम होना चाहिए—उन्हें इंसान के लिए आसान बनाना।
एक ऐसी व्यवस्था जहां नागरिक को पांच अलग-अलग वेबसाइटों पर पांच अलग-अलग खाते बनाने की जरूरत न पड़े, जहां हर विभाग का अनुभव बिल्कुल अलग न हो और जहां सरकारी सेवा लेने के लिए किसी तकनीकी विशेषज्ञ की मदद लेना सामान्य बात न बन जाए।
हमें ऐसी वेबसाइटें चाहिए जो कम इंटरनेट पर भी काम करें, पुराने फोन पर भी चलें, भारतीय भाषाओं को अच्छी तरह समझें और ऐसे व्यक्ति को भी रास्ता दिखाएं जिसे तकनीक की ज्यादा जानकारी नहीं है।
क्योंकि आखिरकार तकनीक की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसे बनाने में कितनी जटिल इंजीनियरिंग लगी।
उसकी सफलता इस बात से मापी जानी चाहिए कि उसे इस्तेमाल करने वाले इंसान की जिंदगी कितनी आसान हुई।
भारत डिजिटल भविष्य की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में सरकारी वेबसाइटें केवल सूचना देने वाले पन्ने नहीं रह सकतीं। वे सरकार और नागरिक के बीच सबसे महत्वपूर्ण संपर्क बिंदुओं में से एक बन चुकी हैं।
इसलिए डिजिटल भारत का अगला लक्ष्य सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि नागरिक को सरकारी दफ्तर न जाना पड़े।
लक्ष्य यह होना चाहिए कि सरकारी वेबसाइट इस्तेमाल करते समय उसे सरकारी दफ्तर की याद ही न आए।
— हरषित त्रिपाठी
इंजीनियरिंग छात्र एवं संस्थापक, Hatri Technologies
