18 राज्यों के 250 से ज्यादा नमूनों में क्लोराइड और नमी को लेकर वाहन कंपनियों की आंतरिक चिंता सामने आई; सरकार और तेल कंपनियां ई20 को मानकों के अनुरूप बता रही हैं
नई दिल्ली। देश में ई20 पेट्रोल को लेकर चल रही बहस अब केवल माइलेज कम होने या पुराने वाहनों पर इसके असर तक सीमित नहीं रह गई है। 13 अगस्त को सामने आई एक नई रिपोर्ट ने ई20 की गुणवत्ता और सरकार की निगरानी व्यवस्था को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
रॉयटर्स ने प्रमुख वाहन कंपनियों की आंतरिक बातचीत और उद्योग से जुड़े दस्तावेजों की समीक्षा के आधार पर बताया है कि मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स और महिंद्रा से जुड़े अधिकारियों ने ई20 पेट्रोल के कुछ नमूनों में क्लोराइड और नमी की मात्रा को लेकर चिंता जताई थी। उद्योग स्तर पर 18 राज्यों से लिए गए 250 से अधिक नमूनों की जांच का उल्लेख इन दस्तावेजों में मिलता है। कुछ नमूनों में निर्धारित सीमा से अधिक क्लोराइड पाए जाने की बात सामने आई है।
यहीं से सरकार की भूमिका पर सवाल उठता है।
अगर ईंधन के कुछ नमूनों में ऐसी समस्या सामने आई थी, तो आम उपभोक्ता को इसकी जानकारी कितनी पारदर्शिता के साथ दी गई? और क्या देशभर में ई20 को व्यापक रूप से लागू करने से पहले पेट्रोल पंपों पर ईंधन की गुणवत्ता जांच के लिए पर्याप्त व्यवस्था मौजूद थी?
इन सवालों का जवाब अभी पूरी तरह साफ नहीं है।
सरकार कह रही है- ई20 सुरक्षित है
सरकार का पक्ष इससे बिल्कुल अलग है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने जुलाई में कहा था कि ई20 कार्यक्रम को वैज्ञानिक परीक्षण और विभिन्न हितधारकों के साथ सलाह-मशवरे के बाद लागू किया गया है। सरकार ने यह भी कहा कि प्रयोगशाला परीक्षण और क्षेत्रीय परीक्षणों में ई20 को निर्धारित मानकों के तहत सुरक्षित पाया गया है।
सरकारी तेल कंपनियों इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने भी पिछले सप्ताह ई20 की गुणवत्ता को लेकर उठी चिंताओं को खारिज किया था। कंपनियों के मुताबिक, देशभर में किए गए परीक्षणों में पेट्रोल, इथेनॉल और ई20 के नमूनों में क्लोराइड की मात्रा निर्धारित सीमा के भीतर मिली। करीब 90 हजार पेट्रोल पंपों के भूमिगत टैंकों की जांच में पानी के प्रवेश का मामला भी सामने नहीं आने की बात कही गई।
तो फिर सवाल यह नहीं है कि “ई20 सुरक्षित है या नहीं” का फैसला आज ही कर दिया जाए।
सवाल यह है कि जब अलग-अलग जांचों से अलग तस्वीर सामने आ रही है, तो सरकार स्वतंत्र और सार्वजनिक जांच के आंकड़े सामने क्यों नहीं रखती?
सबसे बड़ा विवाद शिकायत वापस लेने का
मामले को और दिलचस्प बनाता है वाहन उद्योग संगठन सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स यानी सियाम का घटनाक्रम।
रॉयटर्स के मुताबिक, सियाम ने 28 जुलाई को ईंधन की गुणवत्ता को लेकर सरकार के सामने चिंता रखी थी। इसके बाद संगठन ने अपनी शिकायत वापस ले ली और कहा कि उसके कुछ आंकड़ों को दोबारा सत्यापित करने की जरूरत है।
यही वह बिंदु है जिस पर सरकार और उद्योग दोनों से सवाल पूछे जाने चाहिए।
अगर आंकड़े गलत या अधूरे थे तो उन्हें सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए। और अगर आंकड़ों में वास्तविक समस्या थी, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि समस्या कहां थी और उसे दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए।
क्योंकि अंत में इसका असर सीधे उस व्यक्ति पर पड़ता है जो हर महीने अपनी जेब से पेट्रोल खरीद रहा है।
सरकार के अपने आंकड़ों में भी एक सवाल
ई20 नीति पर सरकार की आलोचना करने की एक और वजह है।
जुलाई में सरकार ने संसद में बताया था कि देश में कितने प्रतिशत पेट्रोल वाहन पूरी तरह ई20 के अनुकूल हैं, इसका कोई अलग आकलन नहीं किया गया है। उस समय देशभर में ई20 ही मानक पेट्रोल के रूप में उपलब्ध था।
यानी एक तरफ सरकार ई20 को देशभर में लागू कर चुकी है, दूसरी तरफ संसद में यह जानकारी सामने आई कि पूरे वाहन बेड़े में ई20 अनुकूलता का प्रतिशत निर्धारित नहीं किया गया है।
यहां सरकार से एक सीधा सवाल बनता है:
अगर ई20 देश का मानक पेट्रोल बनना था, तो क्या पहले यह पता करना जरूरी नहीं था कि देश में चल रही कितनी गाड़ियां वास्तव में इसके लिए तैयार हैं?
सरकार का तर्क है कि ई20 के लिए व्यापक वैज्ञानिक परीक्षण किए गए हैं और पुराने वाहनों में भी कोई व्यापक असामान्य क्षति सामने नहीं आई है।
लेकिन नीति की सफलता केवल प्रयोगशाला परीक्षण से नहीं तय होती। सड़क पर चल रही करोड़ों गाड़ियों, अलग-अलग उम्र के वाहनों और देशभर के अलग-अलग भंडारण हालात में ईंधन की गुणवत्ता की निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।
असली समस्या ई20 है या ईंधन की गुणवत्ता?
यह अंतर समझना बेहद जरूरी है।
अभी उपलब्ध जानकारी से यह कहना सही नहीं होगा कि ई20 पेट्रोल अपने आप गाड़ियों को खराब कर रहा है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट में उठाई गई चिंता मुख्य रूप से कुछ ईंधन नमूनों में क्लोराइड और नमी से जुड़ी है। वाहन उद्योग से जुड़े लोगों की चिंता यह है कि इस तरह के दूषित ईंधन से ईंधन प्रणाली के कुछ हिस्सों में जंग या दूसरी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। दूसरी तरफ सरकार और तेल कंपनियां कह रही हैं कि उनके परीक्षणों में ई20 निर्धारित गुणवत्ता मानकों के भीतर पाया गया है।
इसलिए इस समय सबसे जिम्मेदार निष्कर्ष यही है कि मामले की स्वतंत्र जांच की जरूरत है।
सरकार को अब क्या करना चाहिए?
सरकार के लिए सबसे आसान रास्ता यह होगा कि वह केवल यह कहती रहे कि ई20 सुरक्षित है।
लेकिन इससे जनता की चिंता पूरी तरह खत्म नहीं होगी।
सरकार को चाहिए कि वह देशभर में लिए गए ई20 नमूनों की विस्तृत जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करे। यह भी बताया जाए कि किन राज्यों में क्लोराइड या नमी की समस्या सामने आई, कितने पेट्रोल पंपों की जांच हुई और कितने नमूने मानकों से बाहर पाए गए।
अगर समस्या ई20 में नहीं बल्कि भंडारण, परिवहन या पेट्रोल पंपों पर पानी या दूसरी मिलावट से जुड़ी है, तो इसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
क्योंकि उपभोक्ता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसकी गाड़ी खराब करने वाला कारण ई20 था या खराब तरीके से रखा गया ईंधन। उसके लिए नुकसान तो नुकसान है।
ई20 भारत की ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकार के मुताबिक इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने, उत्सर्जन घटाने और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिली है।
लेकिन किसी भी बड़ी राष्ट्रीय नीति की सफलता का पैमाना केवल उसके लक्ष्य नहीं होते। उसकी पारदर्शिता, निगरानी और उपभोक्ता का भरोसा भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
फिलहाल ई20 को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार के पास जनता को भरोसा दिलाने के लिए पर्याप्त सार्वजनिक आंकड़े हैं, या उपभोक्ताओं से सिर्फ भरोसा करने को कहा जा रहा है?
इस सवाल का जवाब सरकार और तेल कंपनियों की अगली विस्तृत जांच रिपोर्ट से मिलना चाहिए।
— सर्वोदय शांतिदूत डिजिटल डेस्क