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ज्ञात हो कि एनटीए ने तीन विषयों, अंग्रेज़ी, समाजशास्त्र और कॉमर्स, की यूजीसी-नेट परीक्षा रद्द कर दी है। ये परीक्षाएं जून 2026 में आयोजित की गई थीं और अब गड़बड़ियों और गलतियों का हवाला देते हुए दो महीने बाद रद्द कर दी गई हैं। ये गलतियां एनटीए की अपनी ही समिति ने पाई थीं और इनमें तथ्यात्मक गलतियां, टाइपिंग और अनुवाद की गलतियां, विद्वानों के नामों की गलत स्पेलिंग, किताबों के गलत शीर्षक, गलतियों से भरे सवाल और पिछले साल के सवालों का दोहराव शामिल है। परीक्षा रद्द किए जाने उन छात्रों पर भारी बोझ पड़ा है जिन्होंने परीक्षा के लिए कड़ी मेहनत की थी। इससे केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की जो भी विश्वसनीयता बची थी, वह भी खत्म हो गई है। यह बेहद शर्मनाक है कि जहाँ भारत में जब 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है, उसी के ठीक एक दिन बाद यह रद्दीकरण हुआ है, जो देश के युवाओं के साथ पूरी तरह से धोखा है।
ध्यान देने वाली बात है कि एनटीए का परीक्षाओं में गड़बड़ी, कुप्रबंधन और पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों के कारण परीक्षा रद्द करने का लंबा इतिहास रहा है। पिछले कुछ महीनों में, युवाओं ने एनटीए की भूमिका पर लगातार सवाल उठाए हैं, यहाँ तक कि उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। फिर भी, प्रदर्शनकारी छात्रों और युवाओं की मांग के बावजूद इसे भंग नहीं किया गया है।
यह बेहद अफसोसजनक है कि केंद्र सरकार ने अभी भी अपनी पिछली गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है। जवाबदेही तय करने और सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में सुधार करने के बजाय, वह केवल तात्कालिक समाधान करती रहती है। एनटीए एकऐसी संस्था है जिसे अखिल-भारतीय स्तर की परीक्षाएं आयोजित करने का दारोमदार तो दिया गया है, लेकिन इन परीक्षाओं को कराने के लिए उसके पास अपने स्थायी कर्मचारी लगभग नहीं के बराबर हैं। ऐसी व्यवस्था में सार्वजनिक परीक्षाएं आयोजित करने की मुख्य जिम्मेदारियां निजी एजेंसियों को सौंप दी जाती हैं। यह पिछले कई महीनों से आन्दोलनरत छात्रों और युवाओं की मांग के बिल्कुल विपरीत है। ज्ञात हो कि छात्र-युवा एक पूरी तरह से सक्षम सार्वजनिक परीक्षा संस्था की मांग करते रहे हैं, जिसके पास प्रश्न-पत्र तैयार करने से लेकर छपाई और परिवहन तक, सार्वजनिक परीक्षाओं से जुड़े हर काम को सुनिश्चित करने की क्षमता हो। निजी एजेंसियों को इस प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर रखा जाना चाहिए क्योंकि यह सर्वविदित है कि इन एजेंसियों का मुनाफा कमाने का मकसद सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता रहा है। सार्वजनिक परीक्षाओं का निजीकरण अंततः हर स्तर पर गलतियों और कुप्रबंधन का कारण बनता है। इसलिए, छात्र-युवा सार्वजनिक परीक्षाओं के निजीकरण का लगातार मुखर रूप से विरोध करते रहे हैं।
यह भी बात बेहद महत्त्वपूर्ण है कि यूजीसी-नेट परीक्षाओं को उनके आयोजन के दो महीने बाद रद्द किया गया है। एक समिति द्वारा उक्त परीक्षाओं में कमियां पाए जाने के बावजूद, रद्दीकरण के लिए दिया गया स्पष्टीकरण संदिग्ध है। आज देश के युवा केन्द्रीय शिक्षा मंत्री और मोदी सरकार से जवाब मांग रहे हैं। शिक्षा मंत्री को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके जनता के सवालों का जवाब देना चाहिए।
इसके अलावा, केवाईएस मांग करता है कि एनटीए को भंग किया जाए और उसकी जगह एक ऐसी सार्वजनिक संस्था बनाई जाए जिसके पास समर्पित कर्मचारी हों और जो अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही परीक्षा से संबंधित कार्यों को करने में पूरी तरह सक्षम हो। केवाईएस परीक्षा और शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ है और यदि केंद्र सरकार द्वारा युवाओं के खिलाफ ऐसी किसी नीति को बढ़ावा दिया जाता रहा तो वह युवा आंदोलन को और तेज़ करने का ऐलान करता है।
