एक ऐसा सफर जिसमें मैदान बदले, खेल बदले और भारत की पहचान भी बदली; 1948 की हॉकी से लेकर नीरज चोपड़ा, पीवी सिंधु और भारतीय क्रिकेट के विश्व खिताबों तक
नई दिल्ली। आज़ादी के बाद भारत ने सिर्फ एक देश के रूप में अपनी नई पहचान नहीं बनाई, बल्कि खेल के मैदान पर भी अपनी जगह बनाने की लंबी लड़ाई लड़ी। कभी हॉकी भारत की सबसे बड़ी ताकत थी, तो कभी क्रिकेट ने करोड़ों लोगों को एक साथ जोड़ा। समय के साथ कुश्ती, बैडमिंटन, मुक्केबाजी, निशानेबाजी, एथलेटिक्स और अन्य खेलों में भी भारतीय खिलाड़ियों ने दुनिया को अपनी क्षमता दिखाई।
आज जब भारत दुनिया की सबसे बड़ी खेल शक्तियों में शामिल होने का सपना देख रहा है, तो इस सफर को समझना जरूरी है कि इसकी शुरुआत कहां से हुई थी।
आज़ादी के बाद पहली बड़ी चमक हॉकी से आई
भारत की आज़ादी के अगले ही साल लंदन ओलंपिक में भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीतकर देश को पहला बड़ा खेल गौरव दिया। 1948 की वह जीत इसलिए भी खास थी क्योंकि यह स्वतंत्र भारत का पहला ओलंपिक स्वर्ण था।
इसके बाद 1952 और 1956 में भी भारत ने हॉकी में स्वर्ण पदक जीता। 1960 में रोम ओलंपिक में भारत को रजत से संतोष करना पड़ा, लेकिन 1964 के टोक्यो ओलंपिक में टीम ने फिर स्वर्ण अपने नाम कर लिया।
हॉकी का यह दबदबा 1980 तक जारी रहा। मॉस्को ओलंपिक में भारत ने एक बार फिर स्वर्ण पदक जीता। यह आज तक ओलंपिक हॉकी में भारत का आखिरी स्वर्ण है।
भारत ने स्वतंत्रता के बाद हॉकी में कुल छह ओलंपिक स्वर्ण जीते और 1980 के बाद लंबे समय तक पदक से दूर रहा। फिर टोक्यो 2020 में भारतीय पुरुष टीम ने कांस्य पदक जीतकर 41 साल का ओलंपिक पदक सूखा खत्म किया। पेरिस 2024 में भी टीम ने कांस्य पदक बरकरार रखा।
1952 में कुश्ती से आया एक नया अध्याय
हॉकी के बीच 1952 हेलसिंकी ओलंपिक में महाराष्ट्र के पहलवान खाशाबा दादासाहेब जाधव ने कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा। वह स्वतंत्र भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक पदक विजेता बने।
जाधव की उपलब्धि ने यह दिखाया कि भारत की खेल क्षमता सिर्फ हॉकी तक सीमित नहीं है। आने वाले दशकों में कुश्ती भारत के सबसे मजबूत व्यक्तिगत खेलों में शामिल हो गई।
मिल्खा सिंह ने ट्रैक पर जगाई उम्मीद
1960 के रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह 400 मीटर दौड़ में कांस्य पदक से महज 0.1 सेकंड से चूक गए। पदक नहीं आया, लेकिन उनकी कहानी भारत के खेल इतिहास की सबसे प्रेरणादायक कहानियों में शामिल हो गई।
'फ्लाइंग सिख' ने 1958 और 1962 एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीते और भारत में एथलेटिक्स को नई पहचान दिलाई।
उनके बाद पी.टी. उषा ने भी भारतीय एथलेटिक्स को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती दी। 1984 लॉस एंजिल्स ओलंपिक में वह 400 मीटर बाधा दौड़ के फाइनल में बेहद मामूली अंतर से पदक से चूक गईं।
1983: जब क्रिकेट ने भारत की तस्वीर बदल दी
अगर भारतीय खेल इतिहास में किसी एक दिन ने क्रिकेट को देश की सबसे बड़ी खेल शक्ति बना दिया, तो वह 25 जून 1983 था।
कपिल देव की कप्तानी में भारतीय टीम ने लॉर्ड्स में वेस्टइंडीज को हराकर पहली बार क्रिकेट विश्व कप जीत लिया। उस समय किसी ने शायद कल्पना भी नहीं की थी कि यह जीत आने वाले दशकों में भारतीय क्रिकेट को किस ऊंचाई तक ले जाएगी।
1983 की उस जीत ने क्रिकेट को देश के कोने-कोने तक पहुंचाया और एक पूरी पीढ़ी को इस खेल से जोड़ दिया।
इसके बाद सचिन तेंदुलकर जैसे खिलाड़ियों ने भारतीय क्रिकेट को नई पहचान दी। 2007 में भारत ने पहला टी20 विश्व कप जीता और 2011 में महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में 50 ओवर का विश्व कप दूसरी बार अपने नाम किया।
2024 में भारतीय क्रिकेट ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की। रोहित शर्मा की कप्तानी में भारत ने दक्षिण अफ्रीका को हराकर टी20 विश्व कप जीता और 11 साल के आईसीसी ट्रॉफी के इंतजार को खत्म किया।
2000 के बाद व्यक्तिगत खेलों में आया बदलाव
साल 2000 तक भारत के ओलंपिक इतिहास में व्यक्तिगत खेलों में पदक बेहद कम थे। सिडनी ओलंपिक में कर्णम मल्लेश्वरी ने भारोत्तोलन में कांस्य पदक जीतकर भारतीय महिलाओं के लिए एक नया रास्ता खोला।
2004 एथेंस ओलंपिक में राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने निशानेबाजी में रजत पदक जीता। इसके चार साल बाद बीजिंग में अभिनव बिंद्रा ने 10 मीटर एयर राइफल में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया।
बिंद्रा स्वतंत्र भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता बने।
लंदन से टोक्यो तक बढ़ती पदकों की कहानी
2012 लंदन ओलंपिक भारत के लिए बेहद सफल रहा। भारत ने छह पदक जीते। विजय कुमार और सुशील कुमार ने रजत, जबकि गगन नारंग, साइना नेहवाल, मैरी कॉम और योगेश्वर दत्त ने कांस्य पदक हासिल किया।
2016 रियो ओलंपिक में पीवी सिंधु ने रजत और साक्षी मलिक ने कांस्य पदक जीतकर भारतीय महिला खिलाड़ियों की ताकत को नई पहचान दी।
2020 टोक्यो ओलंपिक भारत के लिए ऐतिहासिक रहा। नीरज चोपड़ा ने भाला फेंक में स्वर्ण पदक जीतकर एथलेटिक्स में भारत का पहला ओलंपिक स्वर्ण दिलाया। मीराबाई चानू और रवि कुमार दहिया ने रजत, जबकि पीवी सिंधु, लवलीना बोरगोहेन, बजरंग पुनिया और भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने कांस्य पदक जीते।
पेरिस में भारत की नई पीढ़ी
2024 पेरिस ओलंपिक में भारत ने एक बार फिर कई खेलों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। मनु भाकर ने निशानेबाजी में दो कांस्य पदक जीतकर इतिहास बनाया और एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली स्वतंत्र भारत की पहली खिलाड़ी बनीं।
नीरज चोपड़ा ने भाला फेंक में रजत पदक जीता। भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने लगातार दूसरे ओलंपिक में कांस्य पदक हासिल किया, जबकि स्वप्निल कुसाले ने निशानेबाजी में कांस्य पदक जीता।
पीवी सिंधु पहले ही दो अलग-अलग ओलंपिक में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन चुकी थीं। उनके साथ साइना नेहवाल, मैरी कॉम, मीराबाई चानू और मनु भाकर जैसी खिलाड़ियों ने भारतीय महिला खेल को नई ऊंचाई दी।
क्रिकेट से आगे बढ़ता भारत
भारत का खेल सफर अब सिर्फ क्रिकेट और हॉकी तक सीमित नहीं है। बैडमिंटन में प्रकाश पादुकोण से शुरू हुई कहानी साइना नेहवाल और पीवी सिंधु तक पहुंची। कुश्ती में सुशील कुमार, योगेश्वर दत्त, साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया ने देश को गौरवान्वित किया।
निशानेबाजी में अभिनव बिंद्रा से लेकर मनु भाकर और गगन नारंग तक भारत ने मजबूत आधार बनाया। मुक्केबाजी में मैरी कॉम और लवलीना बोरगोहेन ने विश्व मंच पर भारत की पहचान मजबूत की।
एथलेटिक्स में नीरज चोपड़ा ने वह कर दिखाया जिसकी कल्पना भारत में लंबे समय तक मुश्किल मानी जाती थी।
लेकिन सफर अभी पूरा नहीं हुआ
भारत ने आज़ादी के बाद खेलों में लंबा सफर तय किया है, लेकिन तस्वीर अभी पूरी तरह बदलनी बाकी है।
ओलंपिक में भारत की पदक संख्या अभी भी दुनिया की कई बड़ी खेल शक्तियों की तुलना में कम है। देश में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन जमीनी स्तर पर सुविधाएं, प्रशिक्षित कोच, खेल विज्ञान, पोषण, वित्तीय सहायता और ग्रामीण क्षेत्रों तक बेहतर खेल ढांचे की जरूरत अभी भी बनी हुई है।
यही कारण है कि अब भारत की नजर सिर्फ पदक जीतने पर नहीं, बल्कि एक ऐसी खेल व्यवस्था बनाने पर है जो छोटी उम्र से प्रतिभाओं को पहचान सके और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा सके।
इसी सोच के साथ सरकार ने 2036 ओलंपिक की मेजबानी की महत्वाकांक्षा के बीच 5 से 15 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए देशव्यापी प्रतिभा खोज अभियान की घोषणा भी की है।
79 साल की आज़ादी, अनगिनत खेल कहानियां
1948 के हॉकी स्वर्ण से लेकर 1983 के क्रिकेट विश्व कप, अभिनव बिंद्रा के ओलंपिक स्वर्ण, 2011 के क्रिकेट विश्व कप, नीरज चोपड़ा के ओलंपिक स्वर्ण और 2024 के टी20 विश्व कप तक भारत के खेल सफर में जीत के साथ-साथ संघर्ष भी रहा है।
हर पीढ़ी ने अगली पीढ़ी के लिए रास्ता थोड़ा और आसान किया है।
आज भारतीय खिलाड़ी सिर्फ पदक जीतने के लिए मैदान में नहीं उतरते। उनके पीछे करोड़ों भारतीयों की उम्मीदें होती हैं और उनके सामने एक ऐसा भारत है जो अब दुनिया से सिर्फ मुकाबला नहीं करना चाहता, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच पर अपनी पहचान बनाने का सपना देखता है।
आज़ादी के बाद भारत का खेल सफर इसलिए सिर्फ पदकों की सूची नहीं है। यह उन खिलाड़ियों की कहानी है जिन्होंने सीमित संसाधनों से शुरुआत की, हार के बाद वापसी की और देश को यह विश्वास दिलाया कि भारतीय तिरंगा किसी भी मैदान पर सबसे ऊंचा लहर सकता है।
— सर्वोदय शांतिदूत स्पोर्ट्स डेस्क
