वेव सिटी थाने से जुड़ा मामला, महिला की शिकायत पर कार्रवाई न होने को लेकर अदालत ने मांगा जवाब
गाजियाबाद। महिला की शिकायत में संज्ञेय अपराध की जानकारी सामने आने के बावजूद एफआईआर दर्ज न करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस के अधिकारियों पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को मामले की जांच करने और गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर, वेव सिटी थाने के प्रभारी समेत संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच करने का निर्देश दिया है।
मामला एक महिला की शिकायत से जुड़ा है, जिसने अपने नियोक्ता पर यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़, धमकी और अन्य गंभीर आरोप लगाए थे। महिला के मुताबिक, उसने पुलिस से शिकायत की, लेकिन शुरुआत में उसकी शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं की गई।
महिला ने बाद में गाजियाबाद की अदालत का रुख किया। मजिस्ट्रेट के निर्देश के बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया। इसके बाद आरोपी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एफआईआर रद्द करने की मांग करते हुए याचिका दाखिल की।
हाईकोर्ट की पीठ ने आरोपी की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि शिकायत में अगर संज्ञेय अपराध की जानकारी सामने आती है तो पुलिस का काम शिकायत दर्ज करना और उसके बाद कानून के मुताबिक जांच करना है। शिकायतकर्ता से शुरुआत में ही व्हाट्सऐप चैट, कॉल रिकॉर्डिंग या दूसरे सबूत जुटाने की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
अदालत ने गाजियाबाद पुलिस की शुरुआती कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए यह भी पूछा कि 7 जुलाई 2026 को पुलिस कमिश्नर को दी गई शिकायत के बाद एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की गई और प्रभावी जांच क्यों शुरू नहीं हुई।
पुलिस कमिश्नर समेत अधिकारियों से मांगा जाएगा जवाब
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को मामले की जांच व्यक्तिगत रूप से देखने का निर्देश दिया है। आदेश के मुताबिक, संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर यह पूछा जाना है कि शिकायत मिलने के बावजूद एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई।
पुलिस महानिदेशक को चार सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट व्यक्तिगत हलफनामे के साथ अदालत में दाखिल करनी होगी। जांच में वेव सिटी थाने के पुलिसकर्मियों के साथ-साथ जिले के वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी देखी जाएगी।
अदालत ने जांच की जिम्मेदारी पुलिस पर बताई
अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि एफआईआर दर्ज करने के चरण पर पुलिस को शिकायत में लगाए गए आरोपों की अंतिम सच्चाई तय नहीं करनी होती। आरोप सही हैं या गलत, यह जांच के दौरान सामने आना है।
अदालत के अनुसार, यदि शिकायत में संज्ञेय अपराध की जानकारी है तो पुलिस को शिकायत दर्ज कर कानून के मुताबिक जांच करनी चाहिए। जांच के दौरान सबूत जुटाने की जिम्मेदारी पुलिस की होती है।
इस मामले में अदालत ने यौन उत्पीड़न और कार्यस्थल पर यौन अपराधों से जुड़े मामलों में संवेदनशील और कानून के अनुरूप जांच की जरूरत पर भी जोर दिया।
फिलहाल हाईकोर्ट ने किसी पुलिस अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया है। अदालत ने केवल एफआईआर दर्ज न किए जाने से जुड़े कथित प्रक्रियागत चूकों की जांच के निर्देश दिए हैं। अब पुलिस महानिदेशक की जांच रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि शिकायत पर शुरुआती स्तर पर कार्रवाई में कहां और किस स्तर पर चूक हुई।
— सर्वोदय शांतिदूत डिजिटल डेस्क
