संपादकीय : भड़की चिंगारी का असर ! Editorial


                                                                   संजय त्रिपाठी 



फरत की भड़की चिंगारी अपना असर दिखा रहा है। दो ऐसी घटनाएं सामने आई है जो सोचने पर मजबूर कर रही है कि जिस नफरत की चिंगारी को सरकार, सरकार के चाटुकार और मोदी भक्त हवा दे रहे हैं उसका अंत कैसा होगा ? अब सामुदायिक और धार्मिक नफरत की आग गुत्थम - गुथा होता दिख रहा। कुछ अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि दंगा भी नफरत की बैर बेल बढ़ने और कटुता की सीमा पार होने के कारण ही होता है। घरों में सहोदर भाईयों में बंटवारा भी इसी नफरत की चिंगारी के भड़क कर शोला बनने के कारण ही होता है। जो आज कसीदे पढ़ - पढ़ कर नफरत के बीज बोये जा रहे हैं उसका असर कुछ - कुछ दिखने भी लगा है। लोग मानवता को भूलते जा रहे हैं और हर कार्य और विचार को नफरत की हिकारत के नजरिये से देखते हैं। जरा सोचे आदमी - आदमी से कटता क्यों जा रहा? आपसी दुरिया क्यों बढ़ती जा रही ? प्राकृति तो विनाश का आभास करा ही रही है, मानवता में फैलता स्वार्थ भी विनाश की अगली कड़ी बनेगी, यह कुछ समय बाद स्पष्ट दिखने लगेगा। 

जो हृदय विदारक दृश्य लखीपुरखीरी का वायरल वीडियों में देखने को मिला है वह स्पष्ट करता है कि मंत्री के युवा पुत्र में किसानों के प्रति घोर नफरत भरी थी। जिस तरह घटना को अंजाम दिया गया वह नफरत, घृणा और स्वार्थ को साफ दिखाता है। अब तक विपक्ष, आम जनता व युवा हमेश से ही सरकार के खिलाफ संघर्ष करते रहे है। पर सरकार कभी इनके खिलाफ संघर्ष करती नहीं देखी गई जो आज देखी जा रही है। सरकार विरोधियों के बातों पर अमल करती तथा उसमें सुधार करती ही देखी गई है, पर इस सरकार ने अपने सात वर्षो के शासन में विपक्ष, आम जनता और युवाओं के खिलाफ ही लड़ती देखी गई। खास तौर से सरकार का इशारा कहे या उसकी अनुमति विरोधियों के काट के लिए उसने पूरा सिस्टम ही बना दिया है जो हर बात को गलत सावित करने में लगा है। जरा याद करें लखीमपुर खीरी घटना के बाद  सोशल मीडिया पर सरकार के चाटुकारों व मोदी भक्तों के काॅमेंट जो साफ काट करते हुए कहने लगे कि पहले किसानों ने हमला किया था लाठी डंडा और पत्थरों से जिससे मंत्री की गाड़ियां बेकाबू हो गई और चार किसान मारे गए जिसमें दो नौजवान भी थे। जब साफ और स्पष्ट वीडियो आया जिसमें किसानों के उपर गांड़ी चढ़ाया जाता दिखाई देता है उस पर सरकार के प्रचार तंत्र गलत बताने के लिए टूट पड़ा। क्या इस हरकत से नफरत की उत्पत्ति नहीं होती । 

आज किसान नेता राकेश टिकैत भी कह रहे हैं कि भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या क्रिया की प्रतिक्रिया का नतीजा है। जब नफरत अपनी सीमा से ऊपर हो जायेगी तो ऐसी ही ऊत्तर सामने आयेंगे। दूसरी घटना जम्मू - कश्मीर आतंकियों ने अंजाम दिए। आतंकी बनता ही है नफरत की बेल को सीच कर। उसके अंदर शुरू से ही नफरत की बीज बोयी जाती है, उसे इस तरह की घुटी पिलाई जाती है कि वह हमेशा नफरत का शोला लेकर घूमें और जिस शख्स द्वारा उसे तैयार किया जाता है उसके मकसद को आगे बढ़ाये। नक्सली हिंसा भी इसी का परिणाम है। जम्मू - कश्मीर में आतंकियों ने गैर मुस्लिम को निशाने पर लेते हुए 40 घंटे में 5 हत्याओं को अंजाम दिया जिसमें 4 गैर - मुस्लिम थे। आतंकियों ने आईडी देखे और सिख प्रिसिंपल, हिंदू टीचर को मार डाला। यह नफरत की आग है। फिल्मों में यह डाॅयलाग्य अच्छा लगता है कि लोहा, लोहा को काटता है पर नफरत को काटने के लिए नफरत फैलाने का तरीका कभी भी अच्छा नहीं हो सकता। नफरत को प्यार से ही जीता जाता है। नफरत कभी भी विकास को रोकता ही है चाहे वह परिवार हो या देश। अब भी समय है मानवता के तरफ लोटैं। खासतौर से वे संस्थाएं व राजनीतिक पार्टियां  जो नफरत को आधार बना कर सत्ता पर काबिज होना चाहती हैं।  



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