खुल्लम - खुला : जुबां पे दर्द भरी दास्तां चली आई ! Painful tales came on Juban



                                                              संजय त्रिपाठी 




आज का मौसम बहुत खराब रहा। घरों में दुबके हुए ही आज का खुल्लम - खुला लिखना पड़ रहा। न तो सुबह उठने का मन कर रहा था और न नहाने का, लेकिन दोनों ही करना पड़ा। जब खाना खा लिया और फिर रजाई में घूसने लगे तब सड़क पर इस बारिश में बैठे किसानों पर ध्यान गया । टीवी खोलने पर उनके दर्द देख मन विचलित तो हुआ पर हम कर भी क्या सकते है। हां, जी भर सरकार और सरकार के निर्णय की सराहना करने वाले अंधभक्तों को कोसा। एक चैनल में उसके एंकर को देखा कि वह किसानों को बारिश में बदहाल दिखा तो रहा है, पर उसके बोलने की शैली में किसान ही दोषी लग रहे। कई चैनलों में तो उस समय वैक्सीन के गुण और सरकार द्वारा उसे की जा रही लगाने की तैयारी पर चर्चा गरम थी। इधर बार - बार किसानों के हालात तथा इस मौसम में उनकी स्थिति पर मन भटक जाता। इसी बीच मुरादनगर में श्मशान घाट की हादसा की सूचना मिली । मन की बैचैनी और बढ़ गई और अब दिमाग में घूमने लगा कि कोरोना महामारी ने अब तक करीब डेढ़ लाख लोगों को लील गया है जो प्राकृतिक आपदा कहा जा रहा, पर मुरादनगर की घटना को सिर्फ प्राकृतिक आपदा को दोषी माने या इसके लिए किसी की जिम्मेदारी प्रशासन द्वारा तय की जायेगी। एक तो मरने वाला गया ही अपने साथ 21 लोगों को और ले गया। जब मैं सोचता हूं कि आज से बीस - पच्चीस वर्ष पूर्व कोई हादसा होता और एक व्यक्ति की भी मौत होती तो प्रशासन बेचैन हो उठता। 

सामाजिक संगठने व राजनीतिक लोगों द्वारा सरकार तथा प्रशासनिक अधिकारियों से जवाब - तलब किया जाता। हत्या होने पर पुलिस प्रशासन की नींद हराम हो जाती पर क्या आज ऐसा है ? नहीं न ! अगर आज सामज ऐसा करना भी चाहे तो प्रशासन व सरकार ऐसा करने ही नहीं देगी और जो आगे बढ़ेगा उसको कई परेशानियों से जूझना पड़ेगा। ऐसा एक दिन में नहीं हुआ है, बल्कि प्रशासन और सरकार ऐसी स्थिति व लोगों के मनोवृत्ति में ऐसा परिवर्तन की है जिससे के चलते हम कुछ देर के लिए सिर्फ दुख ही प्रकट कर पाते हैं इससे आगे कुछ नहीं। किसानों के इतनी लंबी धरना - प्रदर्शन हमारे मन में कोई विचार पैदा कर पाया, हमें उनकी परेशानी थोड़ी सी भी विचलित नहीं कर पाई। यही है मनोवृत्ति का बदलाव। इसके लिए लोगों को धन धान्य के भंवर जाल में डाला जाता है, उसे अपना - पराया में बांटा जाता है, उसके मन में कई तरह की घृणा भरा जाता है, उस पर साम, दाम, दंड और भेद चारो का प्रयोग किया जाता है, ताकि वह अपने में ही मस्त रहे। यह स्थिति आज हमारे देश में पैदा कर दी गई है। इसके लिए सिर्फ वर्तमान सरकार को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता , बल्कि इसमें अहम भूमिका इसके पूर्ववर्ती सरकार की भी रही है। जब मैं 1995 - 96 में लोगों की समस्याओं को हल कराने के लिए सड़को पर धरना - प्रदर्शन करता और भाषण देता था तो उस दौरान मेरे भाषण का मुख्य अंश यही होता था कि सरकार हमें उतना ही कमाने दे रही है जिससे दो जून की रोटी मिल जाए और बच्चों के लिए कुछ सोचने पर रात में आराम का समय भी नहीं मिलेगा। 

जब हम बच्चों के लिए सोचेंगे तो स्वभाविक है कि समाज और देश के लिए भी सोचेंगे और ऐसे में शासकों के कार्यशैली के विषय में भी हमें सोचना पड़ेगा । सरकार जनता के इसी सोच से डरती है और सरकार का पहला कार्य होता है जनता को इलझा कर रखो ताकि वह उसके कार्य का आंकलन न कर सके। याद होगा आपको पहले बच्चों के पेपर के समय ही दूरदर्शन नई - नई फिल्में दिखाती थी। आज हम धर्म - जाति, मजहब और हिन्दुस्तान - पाकिस्तान में उलझे हुए हैं और देश का नागरिक इसी तरह दम तोड़ता जा रहा और हम उस पर भी अपना - पराया देखने में लगे हैं। वह समय ज्यादा दूर नहीं होगा जब सब इसका शिकार होंगे और प्रशासन तथा सरकार ठहाका लगाकर हम सब पर हंसेगी । तभी तो कहता हूं कि बहार आने से पहले फिजा चली आई जुबां पे दर्द भरी दास्तां चली आई ! आगे डर है बस इतना ही । राम - राम जी !   


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