नक्सल क्षेत्रों में अहिंसा एवं शांति की आहट का आगाज By ललित गर्ग Non-violence and peace in Naxal areas started









ललित गर्ग
नक्सलवाद
देश की एक बड़ी समस्या है, यह सामाजिक-आर्थिक कारणों से उपजी समस्या है। आदिवासी गरीबी, बेरोजगारी और सरकारी उपेक्षा के कारण एक निचले स्तर की जीवनशैली जीने को मजबूर हैं। स्वास्थ्य-सुविधा के अभाव में गंभीर बीमारियों से जूझते इन क्षेत्रों में असामयिक मौत कोई आश्चर्य की बात नहीं। नक्सलवादी क्षेत्रों का विकास करने के बजाय, उन्हें शिक्षा, चिकित्सा सेवा और रोजगार से मूलभूत सुविधाओं से वंचित किया जाता है। आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार, खेती की दुर्दशा अभी भी जस की तस बनी हुई है। यकीनन इस तरह की समस्याओं में हमेशा असंतोष एवं विद्रोह के बीज होते हैं, इन्हीं असंतोषों की वजह से ही नक्सलवादी समय-समय पर रह-रहकर हिंसा, नफरत, द्वेष, अनैतिकता एवं अपराध की घटनाएँ को अंजाम देते हुए ऐसे वीभत्स एवं तांडव नृत्य उपस्थित करते हैं, जिनसे संपूर्ण मानवता प्रकंपित होती रही है। इन क्षेत्रों में हिंसक मानसिकता ने ऐसा माहौल बना दिया है कि इंसानियत एवं मानवता बेमानी से लगने लगे हैं। अहिंसा एवं चारित्रिक उज्ज्वलता की एक बड़ी प्रयोग भूमि भारत में आज नक्सली हिंसा ऐसी कहानी गढ़ रही है, जिससे घना अंधकार छा रहा है। देश के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भय, अस्थिरता, अनैतिकता, हिंसा एवं अराजकता का माहौल बना हुआ है। जब-जब इस तरह मानवता ह्रास की ओर बढ़ती चली जाती है, नैतिक मूल्य अपनी पहचान खोने लगते हैं, समाज एवं राष्ट्र में पारस्परिक संघर्ष की स्थितियां बनती हैं, तब-तब कोई न कोई महापुरुष अपने दिव्य कर्तव्य, चिन्मयी पुरुषार्थ और तेजोमय शौर्य से मानव-मानव की चेतना को झंुकृत कर जन-जागरण का कार्य करता है। इनदिनों अणुव्रत आन्दोलन के अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण अपनी अहिंसा यात्रा में यही कार्य करते हुए छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की यात्रा पर यात्रायित है, नक्सल प्रभावित क्षेत्र में पहली बार शांति का संदेश देने पदयात्रा पर निकले आचार्य महाश्रमण नक्सलियों और राज्य सरकार के बीच मध्यस्थता करके इस समस्या के समाधान के लिये अग्रसर हंै। वे अपनी अहिंसा यात्रा में स्थान-स्थान पर नक्सलियों से मिलें, उन्हें हिंसा, नफरत एवं द्वेष का मार्ग छोड़ने को प्रेरित किया, जिसका व्यापक प्रभाव देखने को मिला है।

आचार्य महाश्रमण नक्सल समस्या के समाधान के लिये एक ईमानदार कोशिश की जरूरत को महसूस करते हैं। वे हैदराबाद से रायपुर के लिए पदयात्रा पर हैं। करीब 90 ग्रामीण एवं अनेक नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से होते हुए वे छत्तीसगढ़ में घोर नक्सल प्रभावित बस्तर के सुकमा में पहुंचे। उनके साथ पदयात्रा पर चल रहे लोगों ने बताया कि रास्ते भर आदिवासियों ने उनका आशीर्वाद लिया। घने जंगलों से गुजरते समय कुछ ‘वर्दी’ पहने हुए युवकों ने भी उन्हें नमन किया तो कुछ नक्सलियों ने अपना दर्द उनसे साझा किया। आचार्य महाश्रमण का मानना है कि कोई भी व्यक्ति हिंसा के रास्ते पर नहीं चलना चाहता है। उन्हें कुछ लोग अपने स्वार्थों के लिए जानबूझकर गलत रास्ते पर ले जाते हैं। उन्होंने बताया कि वे अपने पदयात्रा के दौरान लोगों को हिंसा का रास्ता छोड़कर अहिंसा एवं शांति के मार्ग पर चलने का संदेश देते हैं। उनके आह्वान पर अब तक सैकड़ों लोग हिंसा, नशा और व्यसन छोड़ चुके हैं। ऐसे लोग व्यसन से दूर रहने की प्रतिज्ञा का आज भी पालन कर रहे हैं। नक्सली भी हिंसा का रास्ता छोड़ना चाहते हैं, जिसके लिये आचार्य महाश्रमण अपने क्रांत चिंतन के द्वारा नक्सलियों का समुचित पथदर्शन कर रहे हैं। अब इस जटिल दौर में सबकी निगाहें उनके प्रयत्नों की ओर लगी हुई हैं, जिनसे नक्सली जिस्मों पर सवार हिंसा, अनैतिकता, विद्रोह एवं नफरत का ज्वर उतारा जा सके। ऐसा प्रतीत होता है कि आचार्य श्री महाश्रमण की अहिंसा यात्रा इन घने अंधेरों में इंसान से इंसान को जोड़ने का उपक्रम बनकर अहिंसा, प्रेम, ईमानदारी, भाईचारा, नैतिकता एवं संतुलित समाज का आधार प्रस्तुत करने को तत्पर है।

आज देश में नक्सली घावों को सहलाने के लिए, उनमें निस्तेज हुई मानवता को पुनर्जीवित करने एवं इंसानियत की बयार को प्रवहमान करने के लिए आचार्य महाश्रमण जैसे महापुरुष/अवतार की अपेक्षा हैं जो मनुष्य जीवन के बेमानी होते अर्थों में नए जीवन एवं अहिंसा का संचार कर सकें। आचार्य महाश्रमणजी के प्रति जनमानस का विशेष रूप से आशान्वित होने का एक बड़ा कारण यह है कि उन्होंने अहिंसा, नैतिकता, लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना, राजनीतिक शुद्धता, चारित्रिक उज्ज्वलता एवं सांप्रदायिक सौहार्द के लिए विशेष प्रयत्न किए हैं, उनके जीवन का सार अहिंसा एवं नैतिकता है। वे एक संतपुरुष हैं, एक संवेदनशील महामानव हैं। धर्म जगत के वे ऐसे आविष्कारक हैं जो स्वयं अहिंसा का जीवन जीते हुए मानव मात्र में अहिंसा को प्रतिष्ठित कर सकते हैं। स्वयं पवित्रता एवं चारित्रिक उज्ज्वलता का जीवन जीते हुए अणुव्रत आन्दोलन के अनुशास्ता के रूप में देश एवं दुनिया में नैतिकता की प्रतिस्थापना कर सकते हैं।

आचार्य श्री महाश्रमण छह वर्ष पूर्व राजधानी दिल्ली के लालकिले से अहिंसा यात्रा पर यात्रायित हुए और सुदूर प्रांतों एवं पडौसी देश नेपाल, भूटान की पदयात्रा करते हुए कर्नाटक, तमिलनाडू, आसाम, पश्चिम बंगाल, केरल, बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश होते हुए इनदिनों छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विचरण कर रही हैं। इस वर्ष छत्तीसगढ़ के रायपुर में फरवरी-2021 में भव्य मर्यादा महोत्सव समारोह में अपना सान्निध्य प्रदत्त करेंगे। उनकी इस अहिंसा यात्रा एवं पदयात्रा ने राष्ट्रीय ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय होकर सम्पूर्ण मानवता को अहिंसा से अभिप्रेरित किया है, देश ही नहीं, दुनिया की नजरें इस यात्रा में घटित हुई एक अभिनव क्रांति की ओर टकटकी लगाये रही, किस तरह आचार्य महाश्रमण ने मानवीय मूल्यों के विकास, हिंसा से त्रस्त मानवता को त्राण दिया, नैतिक मूल्यों को बलशाली बनाया, भारत की आध्यात्मिक परम्परा को समृद्ध किया, उन अनूठे एवं विलक्षण दृश्यों को निहारा। यह पहला अवसर था जब किसी जैन आचार्य ने पदयात्रा करते हुए हिंसाग्रस्त नक्सल क्षेत्रों का स्पर्श किया।

आचार्य महाश्रमण स्वकल्याण और परकल्याण के संकल्प के साथ 30,000 से अधिक किलोमीटर की पदयात्रा से जनमानस को उत्प्रेरित कर मानवता के समुत्थान का पथ प्रशस्त किया। अहिंसा यात्रा हृदय परिवर्तन के द्वारा अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर हिंसा से अहिंसा की ओर प्रस्थान का अभियान बना है। यह यात्रा कुरूढ़ियों में जकड़ी ग्रामीण जनता और तनावग्रस्त शहरी लोगों के लिए भी वरदान साबित हुई है। जाति, सम्प्रदाय, वर्ग और राष्ट्र की सीमाओं से परे यह यात्रा बच्चों, युवाओं और वृद्धों के जीवन में सद्गुणों की सुवास भरने के लिये तत्पर बनी। आचार्य श्री महाश्रमण ने अहिंसा यात्रा के तीन उद्देश्य निर्धारित किये हैं-सद्भावना का संप्रसार, नैतिकता का प्रचार-प्रसार एवं नशामुक्ति का अभियान। इस यात्रा ने भारत के विभिन्न प्रांतों और अन्य देशों में इंसानियत की ज्योति को प्रज्ज्वलित किया और अब देश की सबसे ज्वलंत समस्या नक्सलवाद को समाप्त करने के लिये प्रयासरत है। विदित हो आचार्य महाश्रमण के गुरु आचार्य तुलसी ने आतंकवाद की आग में झूलस रहे पंजाब समस्या के समाधान में एवं दक्षिण भारत के भाषा-आन्दोलन को शांत करने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उन्हें के गुरु आचार्य महाप्रज्ञ ने गुजरात के अहमदाबाद में आक्रामक साम्प्रदायिक माहौल में मुस्लिम इलाकों में जगन्नाथ यात्रा का नेतृत्व करके दोनों समुदाय में सौहार्द का वातावरण बनाया था। विरासत से चली आ रही इस परम्परा को आगे बढ़ाते हुए आचार्य महाश्रमण अब यदि नक्सल समस्या के समाधान के लिये तत्पर हुए है तो यह एक सुखद अहसास है, निश्चित ही इससे देश की सबसे ज्वलंत हिंसक समस्या के समाधान के रास्ते निकलेंगे।

गांधीजी ने अहिंसा को एक महाशक्ति के रूप में देखा और उसके बल पर उन्होंने भारत को आजादी भी दिलवाई। आचार्य श्री महाश्रमण भी अहिंसा यात्रा के माध्यम से देश और दुनिया में अहिंसा, शांति, सद्भावना, निरोगिता, नैतिकता एवं अमन-चैन की प्रतिस्थापना करते हुए निरन्तर गतिमान रहे हैं। निश्चित ही यह शुभ संकल्प बना और आचार्य महाश्रमण जैसे महापुरुष ही ऐसे संकल्प को आकार देने की सामथ्र्य रखते हैं। वस्तुतः चाहे हिंसा नक्सलियों द्वारा हो अथवा सरकार द्वारा, उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। इनकी हिंसा का शिकार अन्ततः वही आमजन होते हैं जिनके लिए ये कुछ प्राप्त करना चाह रहे हैं। यह सार्वभौमिक सत्य है कि हिंसा से प्राप्त की हुई व्यवस्था ज्यादा दिन तक चल नहीं पाती और अन्ततः टूट जाती है। दूसरी ओर सरकार को भी कानून-व्यवस्था की समस्या से ऊपर उठकर इनकी मूलभूत समस्याओं को दूर करने के प्रयास करने चाहिए। नक्सली विचारधारा से प्रभावित गरीब एवं मजदूर जनता को राष्ट्र की मुख्य-धारा से जोड़ने के लिए हमारे लोकतांत्रिक अंगों-केन्द्र एवं राज्य सरकारों, मीडिया और गैर-सरकारी संगठनों सभी को मिलकर सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता है और आचार्य महाश्रमण के प्रयासों को बल देने की अपेक्षा है। आचार्य महाश्रमण के प्रयत्नों से आदिवासी धरती यानी नक्सल प्रभावित क्षेत्र पुनः अहिंसा, शांति, नैतिकता, सौहार्द एवं इंसानियत की लहलहाती हरीतिमा के रूप में अपनी आभा को प्राप्त करे और ऐसा ही अद्भूत घटित हुआ तो यह एक आध्यात्मिक क्रांति का जीवंत उदाहरण होगा। प्रेषकः


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