भेदभावपूर्ण नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के खिलाफ प्रदर्शन Protest against discriminatory new national education policy


  • नई शिक्षा नीति पूरी तरह से कॉर्पोरेट हितैषी भारत की जनता के साथ आरएसएस, उद्योगों और कॉर्पोरेटों के फायदे के लिए किया जा रहा धोखा

  • केवाईएस ने तुरंत इस नीति को वापस लेने की मांग उठाई

                                                         सर्वोदय शांतिदूत ब्यूरो 




नई दिल्ली। क्रांतिकारी युवा संगठन (केवाईएस) ने आज नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के खिलाफ आयोजित प्रदर्शन में हिस्सेदारी निभाई। संयुक्त रूप से प्रगतिशील संगठनों द्वारा आयोजित किए गए इस विरोध प्रदर्शन को ऑनलाइन तरीके से किया गया। आज भारतीय संसद के मॉनसून सत्र का पहला दिन था, और पुलिस द्वारा शारीरिक प्रदर्शन करने को लेकर रोक लगा दी गयी थी। ज्ञात हो कि पिछले कई सालों से इसके विरोध के बावजूद लायी गयी यह नई शिक्षा नीति देश में शिक्षा की बिलकुल खस्ता हालत को बद-से-बदतर बनाएगी।

इस नीति में आरएसएस, उद्योगों और कॉरपोरेट क्षेत्रों की अनुशंसाओं को खुले तौर पर शामिल किया गया है, जो देश की शिक्षा व्यवस्था को केवल कुछ लोगों का विशेषाधिकार बनाएगी। आज छात्रों और जो शिक्षा से बाहर हैं उनके लिए सबसे जरूरी मुद्दे जैसे सरकारी स्कूलों की संख्या बढ़ाने, इन स्कूलों में होने वाली पढ़ाई की गुणवत्ता, और शिक्षा से बाहर छात्रों को औपचारिक शिक्षा में लाने के लिए सरकार द्वारा ज्यादा फंड आवंटित किया जाना, को नजरअंदाज कर इस नीति द्वारा उल्टे छात्रों को औपचारिक शिक्षा से बाहर करने की कोशिश की जा रही है।  



नई शिक्षा नीति में बिना किसी ठोस कदम के बाल शिक्षा को लागू करने का प्रावधान किया गया है। एक मुकम्मल योजना प्रस्तुत करने के बजाए इस नीति में मौजूदा आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को इस उद्देश्य के लिए 6 महीने के प्रशिक्षण देने की बात कही गई है। इसके अलावा यह कहा गया है कि इस तरह के प्रशिक्षण को ऑनलाइन मोड के माध्यम से प्रदान किया जाएगा, जो वास्तव में प्रशिक्षण के नाम पर एक मजाक है।

इस शिक्षा नीति में कई स्थानों पर सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित वर्गों के छात्रों के बारे में बात की गई है। ऐसे छात्रों के पढ़ने के लिए जरूरी बुनियादी ढाँचे को बड़े पैमाने पर विकसित करने के बजाय, इस नीति में मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षण (ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग- ओडीएल) माध्यम से शिक्षा का प्रावधान किया गया है। इस प्रकार सीधे-सीधे स्कूली स्तर पर व्यापक अनौपचारीकरण का मार्ग प्रशस्त होता है।




देश में गैरबराबरी का एक मुख्य कारण एक बड़े हिस्से के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच की कमी है। देश में अधिक स्कूल खोलने और सामान्य स्कूल व्यवस्था स्थापित करने की तत्काल आवश्यकता है। ऐसी स्थिति में सरकार ने बड़े पैमाने पर निजी स्कूलों को बढ़ावा देने के अपने इरादे को साफ तौर पर जाहिर करती है। पीपीपी मॉडल के जरिये सार्वजनिक शिक्षा में निजी क्षेत्र के प्रवेश के मार्ग को प्रशस्त किया गया है। इस फैसले से बड़े पैमाने पर निजीकरण की शुरूआत होगी और दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और मजदूर वर्ग की पृष्ठभूमि के अधिकांश युवाओं को औपचारिक शिक्षा से बाहर धकेला जाएगा।

छात्रों को मूलभूत सुविधाएं जैसे पाठ्य पुस्तकें भी मुहैया कराने में सरकार अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रही है, और इसका करने के लिए प्राइवेट कंपनियों को आमंत्रित कर रही है। यह सरकार को अपने जिम्मेदारी से पीछे हटने और प्राइवेट कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। इसके अलावा, प्राइवेट संस्थाओं और कंपनियों को स्कूल खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे सरकार पूर्णतः सभी को बराबरी और शिक्षा पहुंचाने की जिम्मेदारी से पीछे हट जाएगी, और शिक्षा के व्यवसायीकरण का मार्ग प्रशस्त होगा।

नई शिक्षा नीति, 2020 में व्यावसायिक शिक्षा (वोकेशनल एजुकेशन) पर बहुत जोर दिया गया है। सरकार का उद्देश्य स्कूली शिक्षा के शुरूआती दौर से ही व्यावसायिक शिक्षा को लाना है। निजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए जो एक आसान विषय होगा, वह वचिंत तबके के छात्र के लिए एक जाल की तरह काम करेगा, क्योंकि इसके तहत उन्हें वे कौशल प्रदान किये जाएंगे, जिससे वे बड़े पैमाने में अनौपचारिक श्रम बाजार में प्रवेश करेंगे। इस तरह से बड़ी संख्या में मजदूर परिवारों से आ रहे छात्रों को उच्च शिक्षा में प्रवेश करने से रोक दिया जाएगा। इसके अलावा, इन नीति में 2025 तक कम से कम 50 प्रतिशत छात्रों को व्यावसायिक शिक्षा देने की बात कही गई है, इसका सीधा मतलब यह है कि बड़े पैमाने पर छात्रों को उच्च शिक्षा से वंचित कर अनौपचारिक श्रम बाजार में भेजने की योजना सरकार कर रही है।

देश में स्कूल जाने वाले छात्रों की सबसे बाद संख्या सरकारी स्कूलों में पढ़ती है जिनके हालात खस्ताहाल हैं। ऐसे में सरकारी स्कूलों में अधिक-से-अधिक संसाधन आवंटित करने की आवश्यकता है। लेकिन सरकार इसके उलट कुछ चुनिंदा छात्रों को स्कूलों में प्रोत्साहित करने की नीति बना रही है और अन्य सभी को शिक्षकों के भरोसे छोड़ रही है। इसके साथ ही सरकार ने स्कूल खोलने  के लिए बनाये गए मानदंडों में छूट दी है, जिससे आधारभूत संरचना और इंतजामों के बिना ही छात्रों को पढ़ने के लिए धकेला जाएगा।

उच्च शिक्षा में भी सरकार की नीति भारी अनौपचारीकरण को बढ़ावा देने के प्रयासों से भरपूर दिखाई पड़ती है। शिक्षा के अनौपचारीकरण, फण्ड में कटौती, सीटों की संख्या घटाना, फीस बढ़ोतरी आदि से बहुसंख्यक छात्र अच्छी और औपचारिक उच्च शिक्षा प्रणाली से वंचित होंगे।

नीतियां दर्शाती हैं कि मौजूद सरकार की मंशा  राष्ट्रीय स्तर पर उच्च शिक्षण संस्थानों में भारी कटौती लाने की है। सरकार विलयन, बंदी और टेकओवर के माध्यम से 50,000 उच्च शिक्षण संस्थानों में कटौती कर उनकी संख्या 15000 तक लाएगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(यूजीसी) के निराकरण और उच्च शिक्षण संस्थानों को दिये जाने वाले अनुदान की अब लोन में तब्दीली सरकारी वित्त पोषित शिक्षा के खात्मे की ओर इशारा कर रही है, जिससे अंततः छात्रों की फीस में भारी बढ़ोतरी होगी और वंचित समुदायों से आने वाले छात्र सरकारी वित्त पोषित उच्च शिक्षा से पूर्ण रूप से बाहर हो जाएंगे। उच्च शिक्षण संस्थानों को दी जाने वाली ग्रेडेड ऑटोनोमी के व्यापक असर यह होगा कि कुछ शीर्ष संस्थान ही सरकारी अनुदान प्राप्त करेंगे, परिणामस्वरूप क्षेत्रीय उच्च शिक्षण संस्थान खत्म होने की कगार पर आ जाएंगे। इसके साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा आयोग के गठन से शिक्षा के केन्द्रीयकरण का प्रयास किया जा रहा है। इस आयोग में राजनेताओं और कॉर्पोरेट्स को शामिल कर सरकार शिक्षा प्रणाली तय करने में उन्हें खुली छूट दे रही है।

संस्थान के स्तर पर, एक बोर्ड ऑफ गवर्नर का गठन होगा जो उच्च शिक्षण संस्थान के सभी निर्णय लेने का हकदार होगा, फंड के इंतेजाम से लेकर शिक्षको की नियुक्ति, तन्ख्वाह, प्रमोशन, और छात्रों से ली जाने वाली फीस आदि तक। शिक्षकों के लिए इससे नौकरी से मनमाने तरीके से निकाले जाने और छात्रों से ऊंची फीस वसूलने की प्रवित्ति बहुत तेजी से बढ़ेगी, और वंचित समाज से आने वाले छात्रों का बड़ा हिस्सा औपचारिक उच्च शिक्षा से बाहर होगा।
साथ ही, उच्च शिक्षा के स्तर पर भी व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है। एक विशेष समिति (एनसीआईवीई) का निर्माण किया जाएगा, जिसमें को व्यावसायिक शिक्षा के शिक्षण संस्थानों में कार्यान्वयन की देखरेख के लिए उद्योगों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा। इससे सिर्फ यह पता चलता है कि छात्रों के एक बड़े हिस्से को अनौपचारिक श्रम बाजार में भेजने के लिए तैयार किया जाएगा, जबकि कुछ अभिजात वर्ग के युवाओं को शिक्षा क्षेत्र में आगे बढ़ने का मौका दिया जाएगा।

नई शिक्षा नीति, 2020 बहुसंख्यक छात्रों को औपचारिक शिक्षा के अधिकार से दूर करने का प्रबंध करती है। भाजपा के एजेंडे के तौर पर लायी गयी इस नीति के तहत स्कूली शिक्षा के अनौपचारिकरण का रास्ता साफ होगा। इस कारण वंचित समुदायों और वर्गों से आने वाले जो पहले ही शिक्षा से बाहर है, उनको शिक्षा तक पहुँचने का रास्ता ही बंद किया जा रहा है। केवाईएस इस नीति की कड़े शब्दों में भर्त्सना करता है और आने वाले दिनों में केंद्र सरकार की वंचित हिस्सों को शिक्षा से बहिष्कृत करने की नीतियों के खिलाफ आंदोलन तेज करेगा।



Share on Google Plus

0 comments:

Post a comment