मजबूर किसान Forced farmer



                                                                     संजय त्रिपाठी 



देश महामारी काल से जुझ रहा है। ऐसे में जब देश आर्थिक संकट से गुजर रहा तो कृषि ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र बचा है जिसने देश को बचाया है फिर भी किसानों का प्रताड़न अनवरत जारी है। अभी दो दिन पूर्व हरियाणा में कुरूक्षेत्र के पिपली में किसान बचाओ आंदोलन के दौरान हजारों किसानों के इक्ट्ठा होने पर पुलिस ने लाठियां भांज किसानों के सर फोड़ दिए। हालांकि कोरोना काल को देखते हुए प्रशासन ने रैली की इजाजत नहीं दी थी, फिर भी हजारो किसान रैली में जुट गए। प्रशासन ने एक दिन पहले धारा 144 भी लगा दिया था और किसानों के बड़े नेताओं को अपने घरों में नजरबंद कर दिया फिर भी किसान पुलिस प्रशासन के सभी हथकंडों से निटते हुए रैली स्थल पर पहुंच गए। किसान मंडी जा रहे थे, उन्हें रास्ते में ही रोक दिया गया जिससे वे जीटी रोड़ पर धरने पर बैठ गए। उत्तेजीत किसानों को रोकने व धरना समाप्त कराने के लिए पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया जिससे भारी संख्या में किसान घायल हो गए। आये दिन किसानों की मांग पर ध्यान न देकर सिर्फ किसानों को लाठी के दम पर दबाया जा रहा। देखने में आ रहा हे कि हर आंदोलन को दबाने के लिए सरकार पुलिस को आगे कर दे रही है, जबकि प्रशासन और सरकार का काम आंदोलन करनेवाली संस्थाओं के मांगों पर विचार - विमर्श करना चाहिए। लेकिन इसके बजाय सरकार की दमन का रास्ता अख्तियार करके किसी आंदोलन की आवाज को खामोश करने की कोशिश अब आम हो गई है। 

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को सरकार की किसी नीति से सहमत नहीं होने, उस पर विरोध जताने और अपनी मांगें सामने रखने का अधिकार होता है। लेकिन उनकी असहमति और आंदोलन के मुद्दों को विचार करने लायक नहीं मानना और हिंसक तरीके से दमन करना किस तरह लोकतंत्र को बचाएगा? क्या पुलिस और प्रशासन के सामने किसानों के आंदोलन में शामिल लोगों से बातचीत के जरिए निपटने के सारे विकल्प खत्म हो गए थे? कोई भी सरकार किसानों की मूल समस्याओं पर कभी भी ध्यान केंद्रीत नहीं कर पाई, जिसका नतीजा है कि देश के अन्नदाता को कई तरह की परेशानियों से गुजरना पड़ रहा है। किसानों की आत्महत्या की बढ़ती संख्या यह बताती है कि हमारे देश के किसान मरने के लिए बेवस और लाचार है। उनकी सुननेवाला कोई नहीं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018 में कृषि क्षेत्र में काम करने वाले 10,349 लोगों ने आत्महत्या की। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2017 में कृषि क्षेत्र (कृषक और कृषि श्रमिक) में कुल 10,655 लोगों ने आत्महत्या की थी जबकि साल 2016 में 11,379 लोगों ने आत्महत्या की। और इस साल 2018 में 10,349 लोगों ने आत्महत्या की। यह देश में इस अवधि में हुए खुदकुशी के मामलों का सात फीसदी हैं, वर्ष 2018 में कुल 1,34,516 लोगों ने आत्महत्या की। 

आज भी यह सिलसिला जारी है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार की ओर से जारी तीन अध्यादेशों को किसानों और खेती की समूची व्यवस्था के खिलाफ माना जा रहा है। इस मसले पर पहले से ही किसानों के बीच असंतोष पनप रहा था कि सरकार ने अध्यादेश जारी करने से पहले किसान संगठनों के साथ विचार-विमर्श नहीं किया और बड़े कारपोरेटों के हित में एकतरफा फैसला लिया। दरअसल, एक नए अध्यादेश के तहत आलू, प्याज, दलहन, तिलहन और तेल के भंडारण पर लगी रोक को हटा लिया गया है। किसानों और किसान संगठनों का कहना है कि हमारे देश में पचासी फीसद लघु किसान हैं, जिनमें से ज्यादातर के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है। अब तमाम सुविधाओं से लैस बड़ी कंपनियां अपने कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगी और बाद में उसका खमियाजा ग्राहकों को उठाना पड़ेगा। असली नुकसान किसानों का होगा। इसी तरह, किसानों का मानना है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग या व्यावसायिक खेती से संबंधित अध्यादेश किसानों को अपनी ही जमीन पर मजदूर बना देगा। फिर किसान उपज व्यापार वाणिज्य संवर्धन और सरलीकरण अध्यादेश-2020 के अमल में आने के बाद व्यवहार में मंडी व्यवस्था खत्म होने की आशंका जताई जा रही है, जिसका फायदा बड़े कारपोरेट और बिचैलियों को होगा। आखिर सरकार किसानों के भीतर उपजी अशंकाओं का समाधान करने के वजाय दमन का रास्ता अख्तियार कर किसका हित सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है। अगर सरकार वास्तविक रूप में किसानों का भला करना चाहती है तो उनके अंदर उपजे अविश्वास को खत्म करें और संगठनों के साथ विचार - विमर्श करने के बाद ही कोई कानून या नियम पारित किया जाए। 

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