भाजपा सरकार की श्रम कानूनों को खत्म करने की कोशिश BJP government tries to abolish labor laws




  • मजदूर एकता केंद्र ने भाजपा सरकार के मजदूर-विरोधी कदम के की कड़ी भर्त्सना की

  • मौजूदा श्रम कानूनों को सख्ती से लागू करने और श्रम कानूनों में सभी मजदूरों को बराबरी सुनिश्चित करने की मांग उठाई

                                                                  विशेष संवाददाता




नई दिल्ली। मजदूर एकता केंद्र (डब्लू.यू.सी.आई) भाजपा सरकार द्वारा संसद में 3 श्रम कानून विधेयक पारित किए जाने की कड़ी भर्त्सना करता है। ज्ञात हो कि कि सत्तारूण भाजपा सरकार द्वारा श्रम कानूनों का सरलीकरण करने के नाम पर श्रम कानूनों को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।

केंद्र सरकार की मंशा के तहत 44 श्रम कानूनों को मात्र 4 कानूनों में सिमटाया जा रहा है। संसद में बिना किसी बहस के इन 4 कानूनों में से 3 को पारित किया जाना दिखाता है कि किस प्रकार भाजपा सरकार पूँजीपतियों और कॉर्पोरेटों को खुली छूट देने के लिए आमादा है। इस मजदूर-विरोधी योजना के पीछे सरकार व्यापार को बढ़ावा देने का बहाना बना रही है, जबकि इसके जरिए पूंजीपति वर्ग को मजदूरों का और भी अधिक शोषण करने का अवसर दिया जाएगा। साथ ही, काम के घंटे बढ़ाने और ठेका प्रथा को कानूनी जामा पहनाने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं।

श्रम विधेयक जिन्हें संसद में पारित किया गया है वो मजदूरों की छटनी को आसान बनाते हैं और इसके बरक्स उनका शोषण के खिलाफ विरोध करने का अधिकार भी छीना जा रहा है। श्रम संबंध कानून के तहत जहां पहले 100 लोगों तक की उद्यमों को मजदूरों की छटनी के लिए राज्य सरकार से इजाजत नहीं लेनी पड़ती थी, वहीं अब 300 मजदूरों वाले उद्यमों तक को इसमें शामिल किया गया है। साथ ही, इस कानून के तहत किसी भी हड़ताल से पहले मजदूरों को 60 दिन का नोटिस देना अनिवार्य होगा। प्रभावी रूप से, इस कानून द्वारा पूँजीपतियों को तो कामगारों को काम से निकालने की आजादी दी जा रही है, लेकिन कामगारों का विरोध करने का भी अधिकार छीना जा रहा है। साथ ही, कामगारों की सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी कानून में सिर्फ कुछ ही कामगारों को लिया गया है, और कामगारों के एक बड़े हिस्से को इससे अलग रखा गया है, जबकि सरकार इन कानूनों द्वारा कामगारों के बहुसंख्यक हिस्से के लिए काम की स्थिति पहले से और भी ज्यादा बदतर बना रही है। इन 3 कानूनों द्वारा राज्य सरकारों को भी किसी भी श्रम कानून का पालन करने में कंपनियों को छूट देने की खुली आजादी है।  

ज्ञात हो कि मौजूदा समय में भारत का कामगार वर्ग अतिशोषणकारी परिस्थितियों में काम करने को मजबूर है। आज भी बिनी किसी सुरक्षा के मानकों के पालन के मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी नीचे काम करने को मजबूर होना पड़ता है। छोटी फैक्ट्रियों में तो सिर्फ न्यूनतम मजदूरी का ही नहीं अन्य श्रम कानूनों का भी खुलेआम उल्लंघन किया जाता है। कम दाम में ज्यादा काम छोटी फैक्ट्रियों में बेहद आम है, जहां न्यूनतम मजदूरी से भी कम वेतन पर मजदूरों को 12-14 घंटे काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। मजदूर बेहद कठिन काम भी बिना किसी सुरक्षा साधनों के करने को मजबूर हैं। आये दिन श्रम कानूनों में बदलाव कर के पूंजीपतियों का मुनाफा बढाया जा रहा है। हर क्षेत्र में ठेकेदारी प्रथा बढ़ी है जिसके कारण ृकंपनियां अपनी मनमर्जी से मजदूर को काम से निकल सकती है। ज्ञात हो देशी-विदेशी कम्पनियाँ श्रम कानूनों को पूरी तरह दरकिनार कर मजदूरों का शोषण कर रही हैं, जिसमे केंद्र सरकार उसका साथ दे रही है। प्राइवेट कंपनियों से नियंत्रण हटाने के नाम पर असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे भारत के बहुसंख्यक कामगारों को अति-शोषित करना और आसान किया जा रहा है।

मजदूर एकता केंद्र भाजपा सरकार द्वारा इन 3 श्रम कानूनों को पारित करने की कड़ी भर्त्सना करता है। साथ ही, वो ऐलान करता है कि आने वाले समय में भाजपा सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ आंदोलन को तीव्र किया जाएगा।   



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