चीते की चाल, बाज़ की नज़र... कुछ ऐसी है स्‍पेशल फ्रंटियर फोर्स की कहानी, जिसने 500 चीनी सैनिकों को खदेड़ दिया Cheetah's move, hawk's eyes ...

                                                     शांतिदूत न्यूज नेटवर्क 




किसी भी देश की सैन्य ताकत से उसके आवाम में सुरक्षा की भावना पैदा होती है और देश की रक्षा के खातिर अपने जान की बाजी लगाना त्याग का सबसे बड़ा उदाहरण भी माना जाता है। चीन ने एक बार फिर घुसपैठ करने की कोशिश की थी लेकिन इस बार भारतीय सेना के विकास रेजिमेंट ने उसका प्लान फ्लॉप किया। चीनी सैनिक आगे तो बढ़े थे घुसपैठ के इरादे से लेकिन इस बार उनका सामना भारतीय सेना के विकास रेजिमेंट के जवानों से हो गया। चोरी-छिपे घुसपैठ की कोशिश वाली आदतों के साथ जबतक चीनी जवानों के पांव पैगोंग त्‍सो के दक्षिणी किनारे तक पहुंचते, उससे पहले ही भारतीय सेना की स्‍पेशल फ्रंटियर फोर्स  ने अपना काम कर दिया। स्‍पेशल फ्रंटियर फोर्स की 'विकास' रेजिमेंट के आगे चीनी टिक नहीं सके। 

पैंगोंग झड़प की कहानी

लद्दाख के पैंगोंग झील के दक्षिण में चालबाज चीन के सैनिकों ने 29-30 अगस्त की रात भारत के इलाकों पर कब्जा करने की कोशिश की और प्राप्त जानकारी के अनुसार करीब 500 चीनी सैनिक आए थे। रात के अंधेरे में ब्लैक टॉप और थाकुंग हाइट्स के बीच टेबल टॉप इलाके पर चीनी सैनिकों ने चढ़ाई शुरू की, लेकिन भारतीय जवान वहां पहले से ही मुस्तैद थे। जवानों ने न सिर्फ चीनी मंसूबों को नाकाम किया बल्कि उन्हें उल्टे पांव वापस भागने पर भी मजबूर कर दिया। 

1962 युद्ध के बाद हुआ गठन




ये एक ऐसी फोर्स है जो चीन बॉर्डर पर खुफिया मिलिट्री ऑपरेशन्स को अंजाम देती है। इस फोर्स की खास बात ये है कि इसमें भारत के रह रहे तिब्बती मूल के जवान शामिल होते हैं। जिन्हें Mountain Warfare महारत हासिल होती है। इस फोर्स का नाम आपने पहले कभी नहीं सुना होगा क्योंकि इसके ऑपरेशन्स की तरह ही ये फोर्स इतनी खुफिया है कि इसके मूवमेंट की जानकारी भारतीय सेना को भी नहीं होती है। इस फोर्स के जवानों को बहादुरी दिखाने पर सार्वजनिक रूप से सम्मानित नहीं किया जाता है। ये खुफिया फोर्स भारतीय खुफिया एजेंसी के अधीन काम करती है। इस फोर्स का गठन भी खासतौर से चीन की साजिशों को ध्यान में रखकर किया गया था। 1962 के युद्ध को कौन भूल सकता है। 1962 की वह तबाही को कौन भूल सकता है जो चीन ने बरपाई लेकिन उसके साथ ही हिंदुस्तान ने याद रखा एक सबक कि दोबारा 62 जैसी नौबत ना आए। उस जंग में चीन भारी पड़ा था और भारत को बहुत कुछ खोना पड़ा था। भविष्य में 1962 जैसे हालात न बने इसके लिए प्रधानमंत्री नेहरू ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के फांउडर डायरेक्टर भोलानाथ मलिक और बीजू पटनायक की सलाह पर एक अलग फोर्स के गठन को मंजूरी दे दी। जिसका नाम स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएसएफ) रखा गया। 14 नवंबर 1962 को ये फोर्स अस्तित्व में आई। शुरू में इसमें 5,000 जवान थे जिनकी ट्रेनिंग के लिए देहरादून के चकराता में नया ट्रेनिंग सेंटर बनाया गया। शुरुआत में पहाड़ों पर चढ़ने और गुरिल्‍ला युद्ध के गुर सीखे। इनकी ट्रेनिंग में राॅ के अलावा अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का भी अहम रोल था। इस फोर्स को अक्‍सर 'इस्‍टैब्लिशमेंट 22' भी कहते हैं।

1971 की जंग,ऑपरेशन विजय, जारी है पराक्रम




1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में ऑपरेशन ईगल को सफल बनाने में इस फोर्स का अहम रोल था। इस ऑपरेशन में इस फोर्स के 46 जवान शहीद हुए थे। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार में भी स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के कमांडोज शामिल थे। सियाचीन की चोटियों पर आपरेशन मेघदूत लांच किये जाने के वक्त भी इस फोर्स के कमांडो ने अहम भूमिका निभाई थी। साल 1999 में कारगिल युद्ध के वक्त भी स्पेशल फ्रंटियर फोर्स ऑपरेशन विजय का हिस्सा थी। 

इस्टैब्लिशमेंट 22 क्यों

मेजर जनरल (रिटायर्ड) सुजन सिंह स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के पहले इंस्पेक्टर जनरल थे। वह दूसरे विश्वयुद्ध में 22 माउंटेन रेजिमेंट के कमांडर थे। उन्हें मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया था और ब्रिटिश भारतीय सेना में उनका अच्छा-खासा कद था।


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