सुप्रीम कोर्ट को जनता की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार को सुनिश्चित करना चाहिए The Supreme Court should ensure the right to freedom of expression of the public



  • प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया जाना चाहिए रद्द

                                                                 विशेष संवाददाता



नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के आज के आदेश में प्रशांत भूषण को अपने ट्वीट्स पर पुनर्विचार करने के लिए कहा गया है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के 14 अगस्त के आदेश के बाद आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को उनके दो हालिया ट्वीट्स के लिए अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया था। इन ट्वीट्स में हालिया दिनों में भारतीय न्यायपालिका जिस तरह से काम कर रही है उसकी आलोचना की गई थी।

उनके ट्वीट्स ने विशेष रूप से न्यायपालिका का जनता के मुद्दों के प्रति उदासीन प्रतीत होने को उजागर किया था, एक ऐसे समय में जब केंद्र और राज्य सरकारों ने देश की जनता को महामारी के दौरान बेसहारा छोड़ दिया था।
प्रशांत भूषण को न्यायालय की अवमानना का दोषी मानना समस्याग्रस्त है, क्योंकि कोर्ट की अवमानना तभी मानी जाती है जब किसी न्यायिक संस्था द्वारा दिये गये आदेश का पालन नहीं किया जाता है। प्रशांत भूषण के ट्वीट किसी भी तरह से सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश या निषेधादेश का उल्लंघन नहीं करता था, बल्कि इन ट्वीट को जनता के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के एक उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। राज्य संस्थानों की आलोचना किसी भी लोकतंत्र को मजबूत करने का कार्य करता है। न्यायपालिका या न्यायिक प्रणाली के कुछ लक्षणों की आलोचना करने के लिए अदालत की अवमानना में भूषण को पकड़ना, उन आवाजों को दबाने के समान है जो कार्यपालिका की बढ़ती शक्ति के खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया की अखंडता को सुदृढ़ करने की मांग करती हैं, और इस प्रकार न्यायिक संस्थानों की आलोचना को अपराध घोषित करता है। यह सजा अदालत के इस अवलोकन के आधार पर दी गई है कि ये ट्वीट न्यायपालिका पर जनता के विश्वास को घटाने का काम करते हैं। हालांकि यह कहा जा सकता है कि इन संस्थानों में जनता का विश्वास पहले से ही कमजोर था। कोई भी लोकतंत्र तभी जिंदा रह सकता है, यदि राज्य संस्थानों की शक्ति राजशाही जैसी सत्ता में परिवर्तित हीं होती है।

प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई प्रदर्शित करती है कि किस तरह राज्य का पूरा ढांचा गर्त में जा रहा है, जिसका न्यायपालिका एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। आज के समय में उनके मुद्दों के प्रति राज्य की उदासीनता के कारण लोगों में भारी आक्रोश है। कार्यपालिका की ताकत के आगे न्यायपालिका ही लोगों की सबसे बड़ी आशा है। क्रांतिकारी युवा संगठन (केवाईएस) प्रशांत भूषण को अवमानना का दोषी ठहराए जाने पर अपना खेद व्यक्त करता है और आम जनता से उनके साथ इस संकट के मौके पर और जन अधिकारों के हनन के खिलाफ खड़े होने का आह्वान करता है। साथ ही, केवाईएस सुप्रीम कोर्ट से अपील करता है कि जनता के अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार को सुनिश्चित करे, और प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई को रद्द करे। लोगों के सभी अधिकारों की रक्षा के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार अलंघनीय है, और इसको कायम रखना हमारा सबसे मुख्य कर्तव्य है।     




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