श्री गुरु हर कृष्ण जी का नाम सिमरन करने से समस्त दुखों का निवारण हो जाता है Simulating the name of Shri Guru Har Krishna Ji


                      श्री गुरु जी के प्रकाश पर्व पर विशेष




सरदार मंजीत सिंह  
सिख इतिहास के अनुसार श्री गुरु हर कृष्ण साहिब जी जब गुरु गद्दी मिली उस समय उनकी उम्र करीब 5 साल 2 महीने व 16 दिन की थी । गुरु हरकृष्ण साहिब जी ने मानवता की भलाई एवं सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया । श्री गुरु हरकृष्ण साहिब जी की यादगार के तौर पर दिल्ली में गुरुद्वारा बंगला साहिब सुशोभित है जिसके दर्शन मात्र से ही इंसान के मन में शांति और दुखों का निवारण हो जाता है। 

आज जहां गुरद्वारा  बंगला साहिब शोभायमान है वहां कभी राजा जय सिंह का बंगला था । गुरु हरकृष्ण साहिब जी के पवित्र चरण इस स्थान पर पड़ने पर यह स्थान पवित्र हो गया । आज भी गुरुद्वारा साहिब में अकाल पुरख की याद में गुरुओं की वाणी के शब्द कीर्तन निरंतर चलता रहता है, लंगर की सेवा भी दिन रात चलती है। गुरु हरकृष्ण साहिब जी जब दिल्ली आए तो उस समय दिल्ली में चेचक की बीमारी महामारी की तरह फैली थी । गुरु हरकृष्ण साहिब जी से लोगों की बीमारी देखी नहीं गयी तब गुरु साहिब ने धरती से अमृत निकाल बीमारी ग्रस्त लोगों को अमृत पिलाया। जैसे जैसे लोग अमृत पीते वैसे वैसे वह ठीक होते चले गए, तब भी गुरु की वाणी दिन-रात इसी तरह गाई जा रही थी। गुरु का यश गाया जा रहा था, परमात्मा की ज्योत गुरु नानक के स्वरूप आठ वे गुरु श्री हर  कृष्ण साहिब जी उस वक्त बंगला साहिब में दुखी पीड़ित लोगों की सेवा कर रहे थे। गुरु हर कृष्ण साहिब जी ने गुरुद्वारा बंगला साहिब में सरोवर भी बनवाया जिसका जलग्रहण करने से रोगियों का रोग में कष्ट दूर होते हैं । गुरु हरकृष्ण साहिब जी का जन्म 1656 में  सातवीं पातशाही श्री गुरु हरि राय जी के घर हुआ। आप की माता का नाम कृष्ण कौर था इतिहास बताता है कि बालपन होने के बावजूद हर कृष्ण जी की निडरता व ऊंची आत्मिक सूझबूझ की वजह से ही उन्हें इस लायक समझा गया । गुरु हर राय जी ने 1661 में बैकुंठ आगमन से पूर्व गुरु हर कृष्ण को आत्मिक बल प्रदान करते हुए गुरु गद्दी पर बैठा कर नारियल व पांच पैसे उनके आगे रख तीन बार परिक्रमा की । औरंगजेब ने आठवीं पातशाही गुरु हर कृष्ण जी की योग्यता परखने के लिए दिल्ली दरबार आने का न्योता दिया। गुरुजी ने ना तो दिल्ली आना चाहते थे और ना ही करामाते दिखाने के पक्षधर थे । गुरुजी ने स्पष्ट इंकार कर दिया तब औरंगजेब ने राजा जयसिंह से श्री गुरु हरकिशन जी से बात कर कर राजी करने को कहा। राजा जयसिंह की बात मानते हुए गुरु जी ने दिल्ली आने का निश्चय कर लिया, मगर गुरु जी ने औरंगजेब से मिलने के लिए साफ इनकार कर दिया । गुरु हरकृष्ण साहिब जी जब दिल्ली आने के लिए राजी हुए तब उनकी उम्र 7 वर्ष थी । 

गुरुजी के साथ अनेकों लोग दिल्ली आना चाहते थे मगर गुरु जी ने मना कर कुछ चुनिंदा लोगों को अपने साथ रख बाकियों को मना किया। रास्ते में पंजों खड़े में रुकने के समय गुरु हरकृष्ण साहिब जी के साथ काफी संख्या में संगत देख पंडित लालचंद ने हैरानी से पूछा कि यह कौन है किसी संगत ने बताया कि यह श्री गुरु हरकृष्ण साहिब जी हैं । पंडित लालचंद बोला द्वापर में कृष्ण ने गीता लिखी यह सात आठ साल का बालक अपने आपको हर कृष्ण कहलाता है लोग इन्हें गुरु कहते हैं। पंडित बोला यह गुरु भी हैं हरि भी हैं और कृष्ण भी । कृष्ण भगवान ने गीता लिखी है गीता के श्लोकों का अर्थ ही बता दे,ं मैं गुरु मान लूंगा । इनमें अगर कोई आत्मिक शक्ति है तो अर्थ बता दें पंडित लालचंद ने अपनी बात गुरु हरि कृष्ण जी के सामने भी रखी । गुरुजी ने कहा श्लोकों का अर्थ करने से यह साबित नहीं होता कि श्लोकों का अर्थ करने वाला महापुरुष है। गुरुजी ने पंडित लालचंद से कहा अगर मैं श्लोक का अर्थ कर भी दूं तो भी तुझे तसल्ली नहीं होगी। गुरु जी पंडित की मंशा जानते थे इतिहास बताता है कि गुरु हरकृष्ण साहिब जी पंडित लालचंद का घमंड चूर करने के लिए किसी पुरुष को सामने लाने के लिए कहा। इस पर पंडित ने जांच के एक छज्जू नाम के एक व्यक्ति को ले आया जो अनपढ़ गवार घास की गठरी उठाकर आ रहा था। पंडित ने उसे गुरुजी के सामने ला खड़ा किया। गुरु साहिब ने छज्जू की तरफ दृष्टि फेरी और छड़ी उसके सिर पर रखते हुए गीता के श्लोकों का अर्थ बताने को कहा। उस छज्जू में गुरु की कृपा से गीता के सभी श्लोकों का अर्थ ठीक बता दिए तो पंडित का सारा घमंड चूर हो गया। इसी छज्जू के घर भाई हिम्मत सिंह का जन्म हुआ जो गुरु गोविंद सिंह जी के द्वारा सजाए के पांच प्यारों में शामिल था। 

राजा जयसिंह ने दिल्ली आगमन पर गुरु हर कृष्ण जी का बेहद आदर सत्कार किया, मगर राजा की रानी गुरु हर कृष्ण जी को बाल उम्र के चलते गुरु बनने पर अचंभित थी, वहम और भ्रम के चलते उसके मन में भी गुरु साहिब की परीक्षा लेने का विचार आया। रानी ने गुरु जी के दर्शन करने की इच्छा व्यक्त की लेकिन इसके साथ ही रानी में गुरु नानक देव जी के घर को परखने की भी ठानी । उसने कई अमीर घरानों की औरतों को अपने महल में बुलाया सभी का लिबास एक से एक बढ़कर था रानी खुद साधारण लिबास में थी। मन में एक विचार था कि यदि गुरु सच्चा है तो वह मुझे पहचान कर मेरी गोद में आकर बैठेगा इतिहास बताता है कि गुरु हर कृष्ण जी जब महल में आए तो सभी औरतों के आगे से निकलकर राजा जयसिंह की रानी की गोद में आकर बैठ गए और कहां मां भूख लगी है। महारानी की खुशी का अंत ना था । दिल्ली पहुंचकर श्री गुरु हर  कृष्ण साहिब जी ने औरंगजेब को मिलने से इंकार कर दिया। एक छोटे से बालक द्वारा बादशाह से मिलने से मना करने पर बादशाह की ख्वाहिश प्रकट करने के बावजूद ना मिलने और नहीं करने की आत्मिक ऊंचाई को अपने आप में एक बड़ी करामात कहा जा सकता है। औरंगजेब भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। जिस बादशाह को देखने के लिए लोग तरसते थे अथवा खौफ खाते थे करीब 8 साल का बालक उस बादशाह के  हुक्म की तामील करने से मना कर रहा था । 

औरंगजेब ने अपने बड़े बेटे को गुरुजी के पास उनकी सेवा के लिए भेजा जोकि गुरु साहिब का हमउम्र था । गुरु जी इस दौरान दिल्ली में धर्म प्रचार के कार्य को देखते थे रोजाना दरबार सजाए जाते संगत दिनों दिन बढ़ती जा रही थी। गुरु जी के दर्शन करने दूर-दूर से लोग आने लगे। औरंगजेब भी गुरु की आत्मिक शक्ति को जान चुका था। गुरु हरकृष्ण साहिब जी ने दिल्ली पहुंचते ही धर्म प्रचार शुरू किया, दिनों दिन संगत बढ़ने लगी। उसी दौरान दिल्ली में चेचक है जा प्रकोप बुरी तरह फैला था। हजारों की गिनती में लोग इस बीमारी के शिकार हो रहे थे । गुरु हरकृष्ण साहिब जी लंगर की प्रथा को शुरू करा दिया। जरूरतमंद को कपड़ों की व्यवस्था भी की जाने लगी। इतिहास के अनुसार गुरु हरकृष्ण साहिब जी से लोगों का दुख देखा नहीं गया। उन्होंने आत्मिक ताकत से अमृत को निकाला अमृत कुंड से अमृत पीने पर संगत ठीक होती चली गई । शहर से यह बीमारी समाप्त हो गयी लेकिन लाखों लोगों के दुखों कष्टों व बीमारियों को गुरु साहिब ने अपने ऊपर ले लिया। गुरु साहिब खुद इस बीमारी से ग्रस्त हो गए गुरु साहिब की यादगार के तौर पर गुरुद्वारा बंगला साहिब शोभायमान है। आज भी गुरुद्वारे में बने अमृत कुंड से लोग अमृत ग्रहण कर रोगों दुखो कष्टों से मुक्ति पाए जाते है,ं हजारों हजारों की संख्या में संगत गुरुद्वारा बंगला साहिब जाकर गुरु के दर्शन कर अमृत कुंड से अमृत पीकर अपना जीवन सफल करते है,ं जहां दिन-रात लंगर चलता रहता है।

सरदार मंजीत सिंह

अध्यात्मिक एवं सामाजिक विचारक



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