मजदूरों के मौत और आह का कौन होगा जिम्मेदार: मनजीत Who will be responsible for the deaths and sighs of laborers: Manjeet







                सरदार मंजीत सिंह
आध्यात्मिक एवं सामाजिक विचारक
जिंदगी में कुछ फैसले ऐसे हो जाते हैं जिनकी समझ हमें बाद में आती हैं । कहीं देश की सरकार देश में लॉकडाउन लगाने में शायद कुछ जल्दबाजी की, जल्दबाजी में कहीं गलत कदम तो नहीं उठा दिया जिसका नुकसान देश की करोड़ों जनता पर पड़ा। देश के प्रधानमंत्री जी ने दुनिया में एक बार फिर साबित किया कि उनमें फैसले लेने की क्षमता है और सारा देश उनके साथ खड़ा है और ऐसी तस्वीर विदेशों में जाए कि हमने कुछ घंटों में ही लॉकडाउन करने का फैसला ले लिया। इससे पूर्व में हमारे देश की सरकार या यह कहें हमारे प्रधानमंत्री जी ने नोटबंदी जीएसटी जैसे फैसले लिए जो ऐतिहासिक फैसलों की गिनती में रही । जिन का रिजल्ट हमें चारों तरफ गलत ही सुनने को मिला । लॉकडाउन लेने का फैसला गलत नहीं था, सारा देश प्रधानमंत्री जी के साथ खड़ा हुआ क्योंकि कोरोना बीमारी जिस तेजी से पूरी दुनिया में फैल रही थी उस समय लॉकडाउन करना जरूरी था।  मगर हमसे गलती हुई कि हमने लॉकडाउन करते ही रेलगाड़ियां बसें या अन्य सुविधाओं को भी बंद कर दिया । एक तरह से 22 मार्च से हम लॉकडाउन में हैं मार्च के महीने की सैलरी मजदूरों को मिल गई मगर काम बंद हो गए। आमदनी का साधन नहीं रहा । जब तक मार्च के महीने की सैलरी चली तब तक मजदूर जहां जहां काम करता था वहीं रुके रहे जब सैलरी समाप्त हो गई और आमदनी का कोई जरिया नहीं रहा, मकान मालिक का किराए का दबाव, बिजली का बिल, राशन व खाने पीने की व्यवस्था चारों तरफ से जब मजदूर घिर गया तब उसे लगा यहां रुकना उचित नहीं । उसी समय कुछ अफवाह फैली जिस कारण दिल्ली आनंद विहार बस अड्डे पर लाखों मजदूर इकट्ठा हो गए फिर यह सिलसिला शुरू हो गया । जो जो प्रवासी मजदूर किस प्रदेश के थे भागना शुरू हो गए अब उसे अपना गांव नजर आने लगा और देखने में आया देश की हर सड़क पर चाहे वह किसी प्रदेश की हो लाखों लाखों मजदूर सड़क पर नजर आने लगे । बेहाल भूखा कोई साधन नहीं सड़कों पर निकल आये । छोटे-छोटे बच्चों के साथ औरतों के साथ भूखा प्यासा जंग लड़ता रेल की पटरी सड़क के किनारे रात को या दिन बस चल दिया घर की राह पर । आदमी औरतें बच्चे बूढ़े सभी चल रहे थे सफर कोई छोटा नहीं था हजार बारह सौ किलोमीटर या उससे भी ज्यादा का सफर मगर चल दिए कतार से कतार मिलाकर । एक्सीडेंट में लोग मरने लगे रास्ते पर बहुत से लोग रेल गाड़ी ने कुचल दिए सोते मजदूरों को कुछ सड़क हादसे पर मर गए ट्रक एक्सीडेंट में मर गए भूख के कारण मौत होने लगी । अप्रैल माह में शुरू हुआ यह फासला मई के अंत तक भी खत्म नहीं हुआ । कुछ औरतों ने सड़क के किनारे ही बच्चे को जन्म दिया, मजदूरों का हाल देखते बेबस लाचार बस चल दिए । जिस से भी बात की गई उसने दोबारा गांव से वापिस दिल्ली महाराष्ट्र गुजरात हरियाणा पंजाब यानी किसी प्रदेश में जाने को मना ही किया ।

यह सब चूक हुई सरकार से अगर लॉक डाउन शुरू करते मगर इस ऐलान के साथ जो देशवासी अन्य किसी प्रदेश से अपने प्रदेश जाना चाहता है तो 10 दिन में रेलगाड़ी या बस के माध्यम से जा सकता है ।  लॉक डाउन भी चलता रहता मजदूर अपने गांव में पहुंच जाता बिना तकलीफ के साथ या फिर सरकार उनकी सैलरी या पैसे का इंतजाम भी करती तो भी शहद और रुक सकते थे । जो फैसले आज सरकार सोच रही है कोरोना बीमारी तो खत्म नहीं हुई, 2 माह से ऊपर हो चुके शायद 31 मई के बाद लॉकडाउन खुल जाए कुछ शर्तों के साथ मास्क पहने दूरी बना कर रहे । कोरोना बीमारी घट नहीं रही बीमारी पहले से रोज बढ़ रही है, मरीज बढ़ते जा रहे हैं हर प्रदेश की सरकार इसमें प्रयास कर रही है । अगर बीमारी फैलती ही जा रही है क्या यह फैसला पहले भी लिया जा सकता था जो मजदूर सड़क पर है भूखा प्यासा है वह अपना गांव या प्रदेश छोड़कर दोबारा दिल्ली की तरफ आना नहीं चाहता । मजदूर अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहा है तभी तो यह शब्द उसके मुंह से निकलते हैं । हमारा मुल्क बड़ा है चीन को छोड़ दिया जाए अगर उससे कम मगर दूसरों से ज्यादा आबादी हमारे मुल्क में है । देश की आबादी 130 करोड़ है आबादी का तीसरा हिस्सा गरीब है जो रोजाना कमाता है और खा लेता है फिर वो दो माह कैसे इंतजार करता भूख बर्दाश्त नहीं होती, मगर भूख से ज्यादा दिन लड़ा भी नहीं जा सकता। सरकार की गलत नीतियों की वजह से देश की करोड़ों करोड़ों की आबादी सड़कों पर आ गई जो तस्वीर हमें देखने को मिली वो अच्छी नहीं रही । 

मजदूरों की सुनने वाला नजर नहीं आया पुलिस प्रशासन ने भी कानून तोड़ने की वजह से उन पर लाठियां चलाई । आज देश की जो तस्वीर नजर आ रही है मजदूर भूखा है सड़क पर है और डरा हुआ है । मजदूर व उनके परिवार पर मौत का साया मंडरा रहा है । मैंने पिछले आर्टिकल में लिखा था लॉक डाउन के बाद की तस्वीर  आज से भी ज्यादा  भयानक हो सकती है । कोरोना से ज्यादा भूख से मौत हो सकती हैं,  अभी तक इस तस्वीर का अंत नजर नहीं आ रहा है । मजदूर बेबस होकर इधर-उधर और ऑफिसों  के चक्कर लगाता नजर आया। इतनी दर्द भरी तस्वीर कभी नहीं देखी थी । जो देखने को मिली कुछ ऐसी तस्वीरें जिनको सुन और देख सोच नहीं पा रहा हूं कि यह हमारे मुल्क की तस्वीरें हैं । एक वीडियो में मजदूर खाने के लिए लड़ते दिखे दूसरी में एक भूखा इंसान मरा हुआ जानवर खाता दिखा । इससे भी दर्दनाक तस्वीर क्या हो सकती है दूसरी तरफ  ज्योति नाम की एक लड़की ने  जो आठवीं कक्षा में पढ़ती है अपने पिता को साइकिल पर बैठा कर  गुड़गांव से  दरभंगा  बिहार तक का सफर तय किया । 9 मजदूरों के शव कुएं में मिले,  सड़क पर रौंदे गए घर लौट रहे मजदूर । वहीं दूसरी तरफ  कोरोना के मरीज घट नहीं बढ़ रहे हैं । इसका जिम्मेदार कौन है ? यही सवाल है मेरा !  यही सवाल है मेरा !!




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