संपादकीय : भीड़तंत्र पर सवाल BY संजय त्रिपाठी Question on mobility



देश में भीड़ द्वारा बढ़ती मौत संस्कृति में लोगों को पीट - पीट कर मौत के घट उतारा जा रहा है यह भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे चिंताजनक पहलू है। एक सभ्य समाज में इस तरह की घटनाओं का कोई स्थान नहीं होता। इस तरह की घटनाओं का ग्राफ जिस तरह तेजी से बढ़ रहा है उससे ऐसा लगता है कि लोगों में अब कानून का भय समाप्त होता जा रहा है। उन्मादी जंगल राज कायम कर रहे हैं और सरकारें चुपचाप देख रही हैं। इस तरह की घटनाएं कानून-व्यवस्था बनाए रखने का दावा करने वाली सरकारों के लिए किसी कलंक से कम नहीं हैं। एक सप्ताह पहले बिहार के छपरा और वैशाली जिले में भीड़ ने जिस तरह से चार लोगों को पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया, उससे साफ है कि पुलिस और प्रशासन ऐसी घटनाओं को रोक पाने में एकदम नाकाम साबित हुआ है। छपरा जिले के एक गांव में जिन तीन लोगों को गांव वालों ने मार डाला, उन पर मवेशी चोरी का आरोप था, जबकि वैशाली में जो युवक मारा गया उसके बारे में कहा गया है कि वह बैंक लूटने आया था। पिछले हफ्ते ही राजस्थान के अलवर जिले में मामूली-सी घटना के बाद एक मोटर साइकिल सवार को भीड़ ने मार डाला था। इस समय देश में दो विचारों पर द्वंद की स्थिति पैदा हो गई है। एक तरफ वे लोग हैं जो देश में अमन - शांति, सौह्यर्द और लोकतंत्र की रक्षा की बात करने पर विश्वास करते हैं । दूसरी तरफ एक नया वर्ग तैयार हुआ है जो अपना जंगल राज कायम करने तथा एक विचारधारा को डराने व धमकाने के तहत ऐसा उत्पाद मचा रहा है। ऐसे कार्यो को ऐसा वर्ग गलत तो बताता है लेकिन और परन्तु जैसे शब्दों से इसकी तुलना कर ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों का मनोबल भी बढ़ाता है। इसमें भी शिक्षित व सभ्य समाज के लोगों की कमी नहीं है। ऐसे लोगों की संख्या भी दिन - पर - दिन बढ़ती जा रही है, जो भीड़तंत्र की घटनाओं पर लेकिन, परन्तु लगाते है और उनका मनोबल भी बढ़ाते हैं। एक समय था जब कभी गांवों में पशु चोरों के साथ ऐसी घटनाएं हो जाती थी, हालांकि उस समय भी जो भीड़ ऐसी घटनाओं को अंजाम देती थी उसे भी कानून का भय रहता था और ऐसी घटनाओं के लिए लोग  बार - बार अफसोस करते थे। आज अफसोस का कोई नाम निशान ही नहीं है। देश में अब यह जोरदार मुद्दा बनता जा रहा है और बनना भी चाहिए क्योंकि ऐसी घटनाएं सबके लिए ही घातक है। अभी तीन दिन पूर्व देश के 49 हस्तियों ने पीएम मोदी को पत्र लिख कर बाॅब लिचिंग यानी भीड़ के हाथों होने वाली घटनाओं का विरोध किया है। इन्होंने यह भी कहा है कि जय श्री राम हिंसा भड़काने वाला नारा बन गया है। लिखे गए इस पत्र पर फिल्म निर्माता-निर्देशक श्याम बेनेगल, मणिरतनम, अनुराग कश्यप, अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा, अपर्णा सेन, सौमित्र चटर्जी और इतिहासकार रामचंद्र गुहा जैसी हस्तियों के हस्ताक्षर हैं। इन्होंने कहा है कि असहमति के बिना लोकतंत्र नहीं होता। देश में ऐसा माहौल बनाया जाए, जहां असहमति को कुचला न जाए। हालांकि इससे पहले भी ऐसे लोगों ने विरोध जताया है और जागरूक लोगों का कर्तव्य ही है विरोध जताना, लेकिन दुःख है कि भारी संख्या में ऐसे लोगों के पीछे वह वर्ग पड़ जाता है जो माॅब लिंचिंग को गलत तो बताता है और लेकिन, परन्तु भी लगाता है। भीड़ के हाथों अब तक जितनी भी हत्याएं हुई हैं, उनमें ज्यादातर मामले बच्चा चोरी, पशु चोरी जैसी घटनाओं से जुड़े हैं। पिछले तीन साल में सबसे ज्यादा सक्रिय गोरक्षक हुए और गोरक्षा के नाम पर कई गो - तस्कर मौत के घाट उतार दिए गए। गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में ये घटनाएं ज्यादा दर्ज हुई हैं। आंकड़े बता रहे हैं कि सन 2010 से अब तक गोहत्या के शक में भीड़ के हमले की सत्तासी घटनाएं र्हुइं, जिनमें चैंतीस लोग मारे गए। गंभीर बात यह है कि इनमें ज्यादातर घटनाएं 2014 के बाद की हैं। लेकिन किसी भी मामले में अब तक कोई ऐसी सख्त कार्रवाई होती नहीं दिखी जिससे कानून हाथ में लेने वालों को कड़ा संदेश जाता। जाहिर है, सरकारों के इस लचर रवैए से तो ऐसा करने वालों का दुस्साहस और बढ़ेगा ही!  इसे रोकना होगा और इस तरह की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें दोनों को पहल करनी ही होगी। 



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