प्रथम ‘सत्याग्रही’ ... संत विनोबा भावे By नरेंद्र कुमार शर्मा First 'Satyagrahi' ... Sant Vinoba Bhave



विनोबा भावे जयंती 11 सितम्बर पर विशेष


नरेंद्र कुमार शर्मा 
भारत भूमि सदैव से ऋषि-मुनियों, संत महात्माओं, योद्धा-पुराधाओं की जन्मभूमि एवं कर्मभूमि रही है। समय-समय अनेक भक्तजन, विद्वजन, संतजन मूर्धन्यचेता, मनस्वती तपस्वी यहां पैदा हुए हैं। जिन्होंने अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व से भारतभूमि को विश्व को सुवासित बना दिया। महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र के गागोडा नामक ग्राम में 11 सितम्बर 1895 को पं. नरहरि भावे के परिवार में एक बालक ने जन्म लिया। बालक का नाम विनायक नरहरि भावे रखा गया। बालक माँ का बहुत दुलारा था सो वे विनायक को ‘विन्या’ नाम से पुकारने लगी। बालक विन्या भी पिता की भांति वैज्ञानिक सोच रखता था और गणित इनका परम प्रिय विषय था। हाईस्कूल में गणित इन्होंने सर्वोच्च अंक प्राप्त किए। वही धर्मपरायणा माँ से भी विन्या को अनुशासन एवं परिवार की आचार संहिता का पालन करने की सीख मिली। माँ विन्या को सन्त ज्ञानेश्वर, सन्त तुकाराम, नामदेव और शंकराचार्य की कथाएं सुनाती, रामायण-महाभारत की कहानियां सुनाती समझातीं। वे विन्या को समझाती ‘‘विन्या, गृहस्थाश्रम का विधिवत पालन करने से माता-पिता तर जाते हैं परंतु ब्रह्मचर्य का पालन करने से तो 41 पीढियों का उद्धार हो जाता है। युवावस्था के प्रथम सोपान में ही विन्या आजन्म ब्रह्मचारी रहने की ठान चुके थे। वहीं महापुरूष उनके आदर्श थे जिन्होंने सत्य की खोज के लिए बचपन में ही वैराग्य धारण कर लिया था। ये सभी महापुरूष उनके मन में बसे थे। पिता की इच्छा थी कि विन्या आधुनिकता के परिपेक्ष्य में फ्रेंच भाषा सीखे और अध्ययन करें परंतु माँ की तीव्र इच्छा- ब्राह्मण का पुत्र है तो संस्कृत पढऩा ज्यादा ठीक है। विन्या ने दोनों का मन रखा। इंटरमीडिएट में फ्रेंच भाषा ली और संस्कृत को अलग से पढऩा जारी रखा। बड़ौदा के प्रसिद्ध पुस्तकालय में वे अधिकांश समय बिताने लगे वहां फे्रंच के साथ पश्चिमी देशों का साहित्य भी गहनता से पढऩे लगे जिससे उन्हें पश्चिम में वैचारिक क्रांति का ज्ञान विषय में यथेष्ट ज्ञान हो गया। इंटर की परीक्षा के लिए उन दिनों मुम्बई की यात्रा छोडक़र वहीं से बनारस (काशी) जाने वाली गाड़ी पकड़ ली। एक प्रकार से मन सन्यास की ओर झुक गया था। काशी पहुंचकर विन्या सन्यास एवं सत्य की खोज के लिए किसी गुरु की तलाश में घूमने लगे। उन्हीं दिनों काशी विश्व विद्यालय में एक बड़ा समारोह हुवा समारोह अति विशिष्ट था। इसमें महात्मा गांधी मुख्य अतिथि के रूप में पधारे थे। उन्होंने अपने अनुभवों राष्ट्र की आवश्यकता (स्वतंत्रता) एवं तत्कालीन परिस्थितियों को एक सूत्र में पिरोकर जो भाषण दिया वह बहुत ही प्रभावी था अगले दिनों सभी समाचार पत्रों में वह पूरा छाया गया। विन्या ने पढ़ा औरकई बार पढ़ा और महात्मा गांधी से इतने प्रभावित हुए कि कह बैठे- इस व्यक्ति में हिमालय की ठंडक (शांति) और बंगाल की धधक (क्रांति) दोनों ही है। वे स्वयं तो रोक न सके और महात्मा गांधी को पत्र लिख दिया कि मैं मिलना चाहता हूं। उनके पत्र की गांधी जी ने निमंत्रण सहित उत्तर दिया। 
जून 1916 में वे गांधी जी से मिलने अहमदाबाद के ‘कोचरब’ आश्रम में मिले। दोनों का यह मिलन क्रांतिकारी था। गांधी जी को जैसे ही पता चला कि अपने माता-पिता को बिना बताए आये हैं तो गांधी जी ने एक पत्र उनके पिता को लिखा कि विन्या हमारे साथ सुरक्षित है और गांधी जी ने ही इन्हें ‘विनोबा’ नाम दे दिया। तब से विनायक का नाम विनोबा भावे हो गया। विनोबा ने स्वयं को आश्रम के लिए समर्पित कर दिया। आश्रम की गतिविधियों, अध्ययपन, अध्यापन, कताई, कृषि कार्य आदि में विनोबा आगे दिखलाई पड़ते। गांधी जी ने कहा ‘यह युवक आश्रम से कुछ लेने नहीं बल्कि कुछ देने आया है’ जैसे-जैसे गांधी जी का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था वैसे ही आश्रम में आने वाले स्वयं सेवक की संख्या भी तेजी से बढ़ रही थी। अहमदाबाद का यह आश्रम छोटा पडऩे लगा तो वर्धा में एक नये आश्रम की शुरूआत की गयी। परंतु उसका संचालन करने वाला को सम्पूर्ण गांधीवादी होना चाहिए और उसके लिए विनोबाजी सर्वश्रेष्ठ थे। अत: अप्रैल 1923 को वर्धा आश्रम हेतु विनोबा जी पहुंच गये। वहां अन्य कार्यों के साथ एक मासिक पत्र ‘महाराष्ट्र धर्म’ का सम्पादन शुरु किया। मराठी भाषा में प्रकाशित होने वाले इस पत्र में विनोबा भावे जी ने नियमित रूप से उपनिषदों एवं महाराष्ट्र के संतों पर लिखना शुरू कर दिया जिसके कारण लोगों में जागरूकता बढ़ी। अभी तक लोग विनोबा जी को गांधी का शिष्य मानते थे परंतु पाठकों को उनकी अध्यात्मकता में गहनता का ज्ञान भी होने लगा।
भूदान यज्ञ : विनोबा जी ने भूदान, ग्रामदान उद्योग दान एवं श्रमदान जैसे अनेक कार्य किये परंतु भूदान के बिना विनोबा अपूर्ण हे। आजादी के बाद सरकार के सामने एक प्रश्न था कि राजा रजवाहों के पास अकूल जमीन थी और उन्हीं के सेवक/सेवादार बिना भूमि के थे। उनकी आजीविका चलने के लिए भी कोई साधन नहीं थे। इस पर विनोबा जी का भी ध्यान था। विनोबा जी ने सोचा कि जमींदार लोग अपनी जमीन का कुछ हिस्सा दान दे दें तो भूमिहीनों का कार्य भी हो सकता है। तेलगांना प्रदेश में उन दिनों जमीदार तथा भूमिहीनों में हिंसात्मक संघर्ष चल रहे थे। विनोबा जी ने वहीं जाना ठीक समझा और नलगोंडा जिले के पोचमपल्ली गांव में पहुंचे। 18 अप्रैल को प्रात: ही वे गांव के दलितों की बस्ती में पहुंचे। उन लोगों की दयनीय दशा देखी तो ग्रामीणों ने अपना दु:ख कहा ‘कि हम बहुत गरीब है। आय के साधन भी नहीं है आप हमें थोड़ी  जमीन दिलवा दें तो हम उस पर मेहनत करके अपना एवं परिवार का पालन कर सकेंगे। विनोबा जी सोच में पड़ गए कि इनकी कैसे सहायता की जाए? तभी उन्होंने अपने साथ उनमें व्यक्तियों से पूछा कि क्या आप में कोई व्यक्ति इन बेसहारा लोगों की सहायता को तैयार हैं?
विनोबा जी के आह्वान पर रामाचन्द्र रेड्डी नाम के सज्जन आगे आये और उन्होंने घोषणा कर दी कि वे अपनी 100 एकड़ भूमि का दान अपने पिताश्री की स्मृति में कर रहे हैं। इस पर विनोबा जी भावुक हो गए। दलितों ने विनोबा जी और रेड्डी जी का जयकार किया। यहीं से विनोबाजी का हौंसला बढ़ता चला गया और अङ्क्षहसात्मक तरीके से अनुनय विनय एवं समझाकर जमींदारों को भूदान के लिए प्रेरित करते चले गए। 27 जून 51 तक उन्होंने 12 हजार एकड़ जमीन दान में प्राप्त कर ली। इसके बाद दो दशक तक विनोबा जी के प्रयासों के प्रतिफल स्वरूप 42 लाख एकड़ भूमि उन्हें भूदान में मिली। इस दान में लोगों का विनोबा जी के प्रति प्रेम एवं श्रद्धा थी। ज्यादातर भूमि दलितों आदिवासियों में बांट दी गयी। विनोबा जी के कार्य एवं ख्याति से प्रभावित होकर जनयप्रकाश नारायण भी उनके साथ जुड़े और जीवनदान किया। मध्य प्रदेश के बीहड़ों में डाकुओं ने सर्वोदयी विनोबा जी के आग्रह पर आत्म समर्पण कर दिया और मुख्य विचारधारा में जुडक़र सफल जीवन यापन किया। आजादी मिलने तक गांधी जी के कंधे से कंधा मिलाकर अनेक आंदोलन सत्याग्रह किये और जेल भी गये। गांधी जी ने ही इन्हें प्रथम सत्याग्रही बनाया। 
उपरोक्त के अतिरिक्त भी विनोबा जी स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। प्रथम ‘मैग्सेसे’ पुरस्कार एवं ‘भारत रत्न’ से अलंकृत थे। सरल मराठी में गीता के अनुवादक, ‘गीताई’ के रचयिता स्वतंत्रता सेनानी राष्ट्रीय अध्यापक एवं गांधी जी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी तथा प्रखर राष्ट्र वादी भी थे। फिर भी विडम्बना है कि आचार्य विनोबा भावे, सन्त विनोबा भावे को पाठ्यक्रम (शैक्षिक) में लगभग भुला दिया गया। नई पीढ़ी शायद ही कुछ जान पायेगी, ऐसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी को। आधुनिक युग के बदलते परिवेश में, महापुरुषों से मिलने वाली जीवन्त प्रेरणा भी शायद बदलने के कगार पर हैं।
नरेंद्र कुमार शर्मा 
राष्ट्र पुरस्कृत शिक्षक



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