संपादकी : नफरत की आग ! By संजय त्रिपाठी



सरहद पर बहुत तनाव है क्या?
पता तो करो कहीं चुनाव है क्या?  राहत इन्दौरी का यह कथन आज बहुत सटीक बैठ रहा। देश के पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और देश में नफरत का दंगाई खेल खुलेआम शुरू हो गया है। जानकारों की माने तो यह बड़े स्तर पर शुरू कराया गया है वोट की राजनीति के ध्रुवीकरण के लिए और इसमें सफलता भी मिलती नजर आ रही है। आज कल कुछ शहरों में हिन्दुवादी युवा बाइक पर शाम को नारा लगाते हुए टुकड़ों में रैली निकालते है, शोर मचाते हैं और तेजी से नारा लगाते बाइक चलाते हैं । कल गाजियाबाद के वसुंधरा सेक्टर - 3 में भी यह नजारा देखने को मिला। हो सकता है कुछ पार्टियों को नफरत फैलाने से ही जीत मिलती हो, कुछ वर्षो से यह देखने को भी मिल रहा है, पर देश और हमारे बच्चों का भविष्य इस नफरत से किस दिशा में जा रहा कभी इसका आंकलन किया गया। हम कैसा भारत अपने बच्चों के हाथों में सौंपना चाहते हैं एक बार इस पर भी मनन - चिंतन करना चाहिए। कहा जाता है कि कुछ समझदार लोग नासमझ और जोशिला युवाओं को गुमराह कर अपना मकसद पूरा करने में इनका इस्तेमाल करते है, खासतौर से आतंकवादी संगठन, लेकिन आज कल तो युवाओं से ज्यादा कुछ लोगों के मकसद पूरा करने में धर्म के नाम पर साधु - संतों को लगाया गया है जो समाज को नई दिशा - नई राह दिखाने के जगह नफरत फैलाने में लगें है। क्या हिन्दू धर्म में साधु - संतों का लिए यह कार्य और यह विचार उचित कहा जा सकता ? आखिर ऐसा क्यों हो रहा जिन्हें सम्मान की नजरों देखा जाता है, जिन्हें सज्जन पुरूष की संज्ञा दी जाती है, जिनपर लोगों को अपार श्रद्र्धा है आज उनका बोल एक समुदाय विशेष के लिए इतना जहरीला हो गया है। जरा सोचें जब सबका विचार इसी तरह जहरीला हो जायेगा तब देश व समाज का क्या होगा ? नफरत की आग इस तरह फलाई जा रही है जो युवाओं व देश के होनहारों को गलता दिशा में भटकाने के लिए काफी है। हरिद्वार के धार्मिक समारोह में एक साध्वी ने कहा कि हिन्दुओं को किताबों को एक तरफ रखकर शस्त्र धारण करना चाहिए ताकि वे संहार कर सकें। दूसरे संत ने कहा कि हिन्दू भारत में अपने तीज - त्योहार नहीं मना पाते, क्योंकि यहां सैकड़ों पाकिस्तानी मुसलमान घुसे बैठे हैं। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी निंदा की, क्योंकि उन्होंने अल्पसंख्यकों के साथ बेहतर वर्ताव की वकालत की थी । इस सभा में यह भी कहा गया कि देश में भिंडरवाले और तमिल आतंकवादी प्रभाकरण जैसे लोगों की जरूरत है। यहां साफ कहा कि मुसलमानों के कत्लेआम की तैयारी करनी होगी हिन्दू देशभक्तों को। इस घटना के बाद भी कई दिनों तक पुलिस के तरफ से कोई गिरफ्तारी नहीं की गई जिससे साफ संकेत मिलता है की इस तरह के नफरत फैलाने का आदेश उपर से मिला हुआ है। सिर्फ यही नहीं कुछ हिन्दू उग्रवादियों ने नारेबाजी करते हुए क्रिसमस के दिन आसाम के एक गिरजाघर में तोड़फोड़ किया । वहां मौजुद लोगों के साथ हाथापाई तक की, वहीं अंबाला के एक गिरजाघर में कुछ नारेगाजी करते हुए हिन्दू वीरसपूतों ने ईसा मसीह की मूर्ति तोड़कर उनका सिर गिरजाघर के बाहर फेंक दिया। नफरत की ही आग है कि अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी को भी कुछ साधु - संतो ने रायपुर के एक सभा में अपमानित किया । इसमें गांधी के हत्यारे गोडसे की महिमामंडन किया गया। यह सब ऐसे अपने आप नहीं हुआ बल्कि इसका रूपरेखा पहले से ही बनाया गया। जरा सोचे जब देश का प्रधानमंत्री महात्मा गांधी के अहिंसा को सही मान उनके सामने नतमस्तक होता हो उनके प्रशंसा में कसीदा पढ़ता हो, दूसरी तरफ उनके हत्यारे के मूर्ति पर माला चढ़ा उसे नमन करता हो तथा उसके कार्य को सही ठहराता हो तो उसके मानने वाले या उसके अनुयायी उसके बताये मार्ग पर ही तो चलेंगे। जो प्रधानमंत्री चुनावी रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश का दौरा कर गंगा स्नान, राम जन्मभूमि जैसे धार्मिक जगहों पर बार - बार जाकर औरंगजेब के साथ शिवाजी की बात करता हो उसके भक्त क्या करेंगे ? चुनावी माहौल में यह सब एक सोची समझी रणनीति के तहत कहा और किया जा रहा है। अब समाज को अपनी दिशा स्वयं तय करनी होगी अन्यथा देश की धरती पर एक और कुरूक्षेत्र बनना तय है। आओ हम सब मिलकर नफरत के जगह शांति का पैगाम फैलाएं ।   



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