सम्पादकीय : उफ ! संवेदना भी मर गई Editorial



                                                                संजय त्रिपाठी 




कोरोना महामारी काल में जैसे - जैसे मंजर सामने आ रहे हैं उसे देखकर व सुनकर मन व्यथित हो जाता है। पहले अस्पतालों में बेड, वेटिलेटर, आईसीयू, आॅक्सीजन सिलेंडर और व्यवस्था को देखकर बेचैनी बढ़ जा रही थी। आज गंगा नदी में तैरते सैकड़ों शव तथा गंगा के किनारे दफनाये गए सैकड़ों शवों को देखकर दिल बैठता जा रहा। मन विचलित हो गया है और कई तरह की धारणायें मन में पैदा हो रही हैं। जब दिल में यह बात आती है कि काश ! इस जगह हम होंगे या हमारा सगा संबंधी होगा तो रात की नींद गायब हो जा रही है। जिस दिन पहली बार बक्सर के पास गंगा में तैरती लाशों का विडियो देखा उस दिन तो रात को न खाना खा पाया और न नींद ही आई। आप विश्वास करे या न करे, पर मेरे साथ यह हकीकत में घटित हुआ । उस दिन से मन करता है कि दिन भर प्रशासन व सरकार को गाली दें। लेकिन अब इससे कुछ होना जाना तो है नहीं, यही सोच कर मन को तस्सली दी जा रही है। केंद्र व दोनों राज्यों जहां गंगा जी में शव मिले हैं वहां बीजेपी की शासन है। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि बीजेपी हिन्दू समर्थक पार्टी हैं और हिन्दुओं के संस्कार व संस्कृति ही इसका केंद्र विन्दू बना हुआ है। जय श्री राम का नारा इसका स्लोगन है जिसके सहारे आज केंद्र के सत्ता पर काबिज है। 

जो हालात आज देश में देखने - सुनने को मिल रहे ऐसा न पहले कभी देखा गया और न सुना गया। 70 वर्ष में तो एक बार भी नहीं । खैर, अस्पताल में बेड नहीं मिला, दवाएं नहीं मिली, आॅक्सीजन नहीं मिला, व्यवस्थाएं सुदृढ़ नहीं मिली फिर भी सरकार के सभी गलतियों को नजरअंदाज किया जाता था, लेकिन इन कष्टों से जुझने के बाद मरीज की मौत हो जाती है और उसके क्रियाकर्म भी धार्मिक रीति रिवाज से न हो पाना सरासर सरकार की लापरवाही मानी जायेगी। सरकार या राजा का काम जनता की रक्षा करना और उसके परेशानियों में खड़ा होना होता है, उसे अपने हाल पर छोड़ देना नहीं । क्या राजा अपना फर्ज यहां निभा रहे ? मरने के बाद लोगों का अंतिम संस्कार उनकी आस्था और परंपराओं के मुताबिक ही किया जाना चाहिए। हिन्दुओं को अग्नी में प्रवाहित करने की परंम्परा है जा सदियों से चला आ रहा, आज हिन्दू हृदय सम्राट केंद्र और राज्य में हैं फिर भी अपनी परंपरा से अलग हट कर हिन्दुओं का संस्कार किया गया। हालांकि गंगा लोक अस्था की नदी है, इसलिए कुछ लोग शवों को गंगा में समर्पित कर देते है । 

जीवनदायनी गंगा की अमृत पानी गंगोत्री से लेकर बंगाल के खाड़ी तक करोड़ो लोगों को जीवन दे रही, ऐसे समय में इसमें कोरोना संक्रमित शवों को डालना कहा तक उचित है। जबकि वैज्ञानिकों का कहना है कि कोई भी वायरस हवा में अगर 4 - 5 घंटे रहता है तो वह पानी में 20 से 25 घंटे तक। उसमें भी गंगा की पानी सबसे ठंढा होता है और इसमें वायरस की क्षमता ज्यादा हो जाती है। जब कोरोना से मरने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ, चारों तरफ श्मशानों में जगह न होने तथा लकड़ी न होने का शोर मचा हुआ था तब सरकार को यह नहीं लगा कि बहुत हिन्दू लोग परेशान होकर शवों को गंगा जी में डालेंगे या दफनायेंगे। कयास लगाए जा रहे हैं कि ये उन गरीब लोगों के शव हैं, जिनके परिजनों के पास उनका अंतिम संस्कार करने के लिए पैसे नहीं हैं। श्मशानों में लकड़ी की किल्लत बढ़ी है, शवों को जलाना खासा महंगा काम हो गया है। अंतिम संस्कार में पंद्रह से बीस हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। ऐसे में उन गरीब लोगों के सामने अपने प्रिय जनों का अंतिम संस्कार करना एक बड़ी समस्या बन गया है, जिनके पास इस घड़ी में दो वक्त की रोटी के भी पैसे नहीं हैं।

वहीं दूसरी तरफ यह भी आशंका जताई जा रही है कि यह प्रशासन द्वारा तो नहीं किया जा रहा। क्योंकि उत्तर प्रदेश में कई जगह प्रशासन खुद शवों को जलाने के बजाय गंगा की कछार में गड्ढे खोद कर उन्हें दफ्न करते देखा जा रहा है। अगर ऐसा है, तो यह ज्यादा चिंता की बात है। एक पूर्व आईएएस ने ट्यूटर पर ऐसा फोटो डाले है। शायद उनके खिलाफ प्रशासन कार्रवाई भी कर रहा। गंगा में तैरती या गंगा के किनारे ही सभी लाशें मिली हैं। गांव का आदमी गंगा जी में डालने दूर - दराज से नहीं आयेगा, क्योंकि उसकी आस्था ज्यादा अपने परंपरा और धर्म से जुड़ा होता है, साथ ही गांवों में लकड़ी, उपला और खर - फूस की कोई कमी नहीं होती। दूसरा सभी बड़ा शहर गंगा के किनारे बसा है और बीमारी का प्रकोप अभी शहर में ही ज्यादा है, गांवों में तो शुरूआत अब हो रही। ऐसे में अस्पतालों के कर्मचारी व प्रशासन के तरफ उंगली उठना स्वभाविक है। इसकी जांच ही सच्चाई की परत खोल सकती है। हालांकि उत्तर प्रदेश प्रशासन पर कोरोना के आकड़ों से खेल - खेलने का आरोप पहले से ही लग रहा है तो मौत के आंकड़े पर ध्यान जाना मुश्किल थोड़ी न है। ऐसे में सरकार व प्रशासन को अपनी नकामियां छिपाने के वजाय समस्या पर काबू पाने के गंभीरता से विचार करना चाहिए। 


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