खुल्लम - खुला: कौन सुनेगा, किसको सुनाये ? इसीलिए ............... ! Who will listen to whom? That's why




                                                                संजय त्रिपाठी 

हमारा देश लोकतांत्रिक देश है। इसे प्रजातंत्र भी कहा जाता है। प्रजातंत्र - प्रजा द्वारा, प्रजा के लिए और प्रजा का शासन है। वहीं दूसरी तरफ इसके अवगुणों पर प्रकाश डालते हुए एक विद्वान का कहना है - ‘ प्रजातंत्र मूर्खो का, मूर्खो के लिए तथा मूर्खो के द्वारा शासन है। ’ हमारे देश के संविधान विद्वेताओं ने प्रजातंत्र के जिस अच्छाई को देखकर इसे एक लोतांत्रिक राष्ट्र बनाया वह तो कहीं दिखता ही नहीं, लेकिन जिस अवगुण को एक विद्वान ने उद्घोषित किया वह हर जगह दिख रहा। यानी इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि प्रजातंत्र में हर तरह से सभी मूर्ख है और मूर्खो के लिए ही यह शासन तंत्र चलाया जा रहा। इसमें जनता का हिस्सा सिर्फ वोट देकर सत्ता में बैठाने तक ही सीमित है, फिर तो सत्ताधारी उसके तरफ देखता भी नहीं। अगर सत्ताधारी का सीना 56 इंच है प्रचार के तहत तो वह सत्ता में बैठाने वाले आम जनता को जरूर एहसास करा देता है कि लो देखों मेरा सीना 56 इंच ही है । न तो मेरे जैसा कोई 70 साल में किया और न आगे करेगा । तुम लोगों के दिमाग में भी यह 56 इंच का सीना मरने के दिन तक घूमता रहेगा। अब तो एक ही रास्ता है या तो चुप हो जाओ नही ंतो अपने आप में उलझ कर मर जाओ। तुम्हारा यहां कोई सुनने वाला नहीं है। तुम्हें नहीं पता कि मेरा सीना 56 इंच है, इसका असर तो तुम्हें दिखना चाहिए। सही भी है जनता जानते हुए उम्मीद लगाये बैठी है, इसे कौन समझाए। इन्हें यह नहीं पता कि कौन सुनेगा, किसे सुनाये इसलिए चुप बैठे हैं। हालांकि जनता भी जान चुकी है कि कौन सुनने वाला है। पहले जिस समाज, संगठन या समूह को सत्ताधारी की कार्यवयवस्था में कोई भी असुविधा होती या गलत दिखाई देता लोग आवाज उठाते । सड़को पर निकल पड़ते और सत्ताधारी उन्हें परेशान तो करता, लेकिन लोगों की आवाज भी सुनी जाती थी। आज कोई सुनने वाला ही नहीं है। कार्यपालिका सबसे बड़ा तानाशाह बना हुआ है क्योंकि उसका तालमेल या सांठगांठ विधायिका से बन गया है। आम जनता की सरकार आम जनता से ही कोसो दूर हो गई है। आज से 25 वर्ष पूर्व प्रशासनिक व्यवस्था और पुलिस व्यवस्था दोनों के कार्य पर एक बार फिर नजर दौड़ा कर देखें, और आज इनके कार्य का आंकलन करे। दोनों में आपको बहुत अंतर नजर आयेगा। दोनों तंत्र आम जनता को आज तुच्छ, निरीह ओर कीड़ा - मकोड़ा की गिनती में रख रखी है। अगर इसके खिलाफ आप आवाज उठाते हैं तो आपकी आवाज हर तरह से दबा दी जाती है। मैं 1987 से गाजियाबाद के राजीव कालोनी से समाज सेवा का कार्य शुरू किया । 

उस समय एक दादा नामक यूनियन लीडर के साथ कालोनी में लोगों की समस्या सुनने व उसका निवारण करने के काम में लगा। बाद में 1889 से खुद अपने कंधे पर भार लेकर लड़ाई लड़ना शुरू किया । इस मामले में कई बार जिला प्रशासन के अधिकारियों व पुलिस विभाग के कर्मचारियों से सामना हुआ। लेकिन उस समय यह हालात नहीं था जैसा आज कल देखने को मिल रहा है। कितनी बार धरना - प्रदर्शन करना पड़ा, कितनी बार भूख हड़ताल और रैलियां निकाल कर आंदोलन करना पड़ा तब जाकर इस कालोनी में कुछ सुविधाएं यहां के लोगों को मिली। बिजली विभाग के कुछ ऐसे अधिकारी भी थे जो मेरी रैली आने की जानकारी सुन अपना आॅफिस बंद कर भाग जाते थे। यह कटोरी मिल से लेकर लाजपतनगर आॅफिस तक चला। लेकिन कभी भी हम लोगों के मांग व आंदोलन को कुचलने का प्रयास नहीं किया गया। पुलिस विभाग भी उस समय आम जनता की बात भी खड़ा होकर सम्मान देनें के बाद तस्सली से सुनती थी। हां, उस समय भी कुछ घटनाएं ऐसी भी सामने आती थी जो मन को विचलित कर देती थी। लेकिन कभी भी आज के जैसा फजीहत नहीं देखने को मिला। 

1995 के बाद थोड़ा बदलाव महसूस किया गया, लेकिन वह भी आम जनता को लेकर अड़ जाने के बाद प्रशासन आपकी ही सुनती थी। उस समय पुलिस द्वारा नेतृत्व करने वाले के खिलाफ कोई कुचक्र न चलाया जाता था और न ऐसा कोई डर लगता था, जैसा आज कल सभी को लगता है। आम जनता के मन में यह घारणा बन गई हैं कि जो जैसा है वही ठीक है, उसी में जीना सीखों । किससे कहोगे और कौन सुनेगा ? ज्यादा करोगे तो पुलिस उठाकर जेल में डाल देगी, फिर करते रहो जेल के अंदर राजनीति। आवाज उठाते रहो व्यवस्था के खिलाफ। अगर इससे भी नहीं मानोगे तो पुलिस तुम्हारा कोई प्रतिद्वदी लाकर उसे पंप भर तुम्हें भीड़ा देगी, देते रहो सफाई। जहां सारा अधिकर सरकारी कर्मचारियों के हाथ में दे दी गई है उस व्यवस्था में जनता सिर्फ टकटकी लगाये घर में छुप कर देख ही सकती है। तभी तो कहता हूं - कौन सुनेगा, किसे सुनाये - इसीलिए चुप रहते हैं। 
इसका अगला भाग अगले अंक में  ...................... 




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