पुलिस सुधार के लिए उठानी होगी आवाज Voice will have to be raised for police reform


                            गाजियाबाद कहिन ................. ! 


                                                                संजय त्रिपाठी 



‘किसी भी लोकतांत्रिक देश में पुलिस बल की शक्ति का आधार जनता का उसमें विश्वास है और यदि यह नहीं है तो समाज के लिये घातक है।’ आज समाज में पुलिस से विश्वास उठता जा रहा है। देश में रोज किसी न किसी राज्य से पुलिस का अमानवीय चेहरा व कार्य सामने आ ही जाता है। उत्तर प्रदेश में कुछ समय से ऐसी घटनाएं सामने आ रही है जिसमें पुलिस की निष्क्रियता और तानाशाही साफ झलकता है। ऐसा नहीं कि पुलिस द्वारा जनता के लिए किये जाने वाले अच्छे कार्यों पर लोग उनको धन्यवाद नहीं देते, लेकिन धन बल के सामने पुलिस बल नतमस्तक नजर आ रहा। कही पुलिस की लापरवाही नजर आ रही तो कही चांदी के जूते मारने की झलक साफ दिख रही। देश में अधिकांशतः राज्यों में पुलिस की छवि तानाशाहीपूर्ण, जनता के साथ मित्रवत न होना और अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने की रही है। रोज ऐसे अनेक किस्से सुनने-पढ़ने और देखने को मिलते हैं, जिनमें पुलिस द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया जाता है। पुलिस का नाम लेते ही प्रताड़ना, क्रूरता, अमानवीय व्यवहार, रौब, उगाही, रिश्वत आदि जैसे शब्द दिमाग में कौंध जाते हैं। आज आम आदमी को अपराधी से जितना डर लगता है, उतना ही डर पुलिस से भी है। उदाहरणार्थ किसी अपराधी गिरोह द्वारा हत्याएँ किये जाने अथवा किसी बड़े बैंक में डकैती डालने की घटना सामने आते ही लोग अपने घरों में दुबक जाते हैं, जब अपराधी अपना काम करके निकल जाते हैं तो लोग अपने घरों से निकलते हैं और पुलिस को देखते ही पुनः एक बार फिर अपने घरों के खिड़की, दरवाजे बंद कर लेते हैं। इन घटनाओं से तो यही प्रतीत होता है कि पुलिस ने जनता का सहयोगी होने के अपने दायित्व को भुला दिया है। 

कानपुर घटना से पुलिस विभाग को भी सबक लेना चाहिए। भ्रष्टाचार में लिप्त पुलिस की अक्रमणीयता का ही नतीजा है कि विकास दुबे जैसे कुख्यात अपराधी के गोली का शिकार आठ पुलिसकर्मियों को होना पड़ा। इस घटना से जहां पूरा समाज पुलिस को लेकर मानवीय दृष्टिकोण से दुखी था, वहीं सरेंडर के बाद सिर्फ अपना बदला लेने के लिए झूठी कहानी गढ़ उसे मुठभेड़ में मार गिराने से पुलिस के प्रति हमदर्दी लोगों के दिल से समाप्त हो गई। साथ ही पुलिस की अपराधियों से साठगांठ का एक अलग बहस शुरू हो गया। दूसरी घटना गाजियाबाद के पत्रकार बिक्रम जोशी की हत्या की घटना ने भी पुलिस पर स्पष्ट अंगुली उठाने का कार्य किया। इमानदार पुलिस कप्तान जनता के घेरे में आ गए हैं। आखिर एक पुलिस कर्मचारी के गलत निर्णय, आरोपियों से सांठगांठ और कार्य के प्रति लापरवाही पूरे पुलिस महकमा पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। उधर मेरठ में मां - बेटी की घटना में पुलिस के भ्रष्टाचार का मामला सामने आने के बाद रही सही कसर भी पूरा हो जाता है। शनिवार को मथुरा के एसडीएम को बदमाशों ने दी धमकी, कहा - समय पूरा हो गया, निपआ देंगे । ऐसे तमाम माले सामने आये हैं किसका किसका जिक्र किया जाए। आखिर कैसे ऐसे हालात में आम जनता पुलिस पर विश्वास कर लेगी। प्रदेश में एक बार फिर अपहरण, हत्या, रंगदारी मांगना, लूट, बलात्कार और बलात्कार के बाद हत्या की घटनाओं की बाढ़ सी आ गई है। मुख्यमंत्री योगी ने दावा किया था कि उनके शासन में या तो अपराधियों की जगह जेल में होगी या फिर वे प्रदेश छोड़ कर भाग खड़े होंगे। मगर हो इसका उलट रहा है। अपराधियों का हौसला बुलंद है वे बेखौफ घूमते नजर आ रहे हैं और सरेआम अपराध करने में उन्हें जरा सा भी भय नहीं है। यहां तक की अपराध करने के बाद जेल से छुट कर आने के बाद मामला दर्ज कराने वाले को अपना निशान बनाते हैं। अगर यही हाल रहा तो आगे मामला दर्ज कराने वालों को पुलिस को संरक्षण देना पड़ सकता है।  

ऐसे में अब समय आ गया है कि आम जनता को पुलिस व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर आवाज उठानी पड़ेगी। जरा गौर करे 2017 के सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले पर जिसमें उसने कहा था - “पुलिस सुधार की दिशा और दशा अपने आप तय हो रही है, हमारी तो कोई सुनता ही नहीं”। ये शब्द हैं देश की सर्वोच्च न्यायपालिका के। विदित हो कि सर्वोच्च न्यायालय ने यह वक्तव्य पुलिस सुधारों को तुरंत लागू किये जाने की मांग करती एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया है। देश की शीर्ष अदालत का इस तरह से निःसहाय हो जाना अखरता है, लेकिन पुलिस सुधारों की प्रगति पर  नजर डालें तो न्यायपालिका का हतोत्साहित होना आश्चर्यचकित नहीं करता है। 

गौरतलब है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही विधि विद्वेताओं ने यह मान लिया कि प्रशासनिक मशीनरी स्वत: ही समाजोन्मुख हो जयोगी। लेकिन जब राजनीतिक सत्ता का चरित्र ही खास नहीं बदला तो नौकरशाही या पुलिस का कैसे बदलती। पुलिस सुधार, केवल 21वीं सदी की जरूरत नहीं है बल्कि आजादी के बाद से ही इसमें सुधार की गुंजाइश थी जो समय के साथ और बढ़ती चली गई। “एक मजबूत समाज अपनी पुलिस की इज्जत करता है और उसे सहयोग देता है, वहीं एक कमजोर समाज पुलिस को अविश्वास से देखता है और प्राय: उसे अपने विरोध में खड़ा पाता है”। 




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