आपकी अच्छाई आपके सामने आती है : मनजीत Your good comes from you






                                                              धर्म - कर्म 


सरदार मनजीत सिंह 
मैं अपनी बात एक बात से शुरू करता हूं । कुछ दिन पूर्व एक दोस्त का फोन आया मैंने पूछा कैसे हो तो उसने कहा गुरुजी करो ना बीमारी के चलते मुझे अगर कुछ हो गया तो मैंने आपका फोन नंबर अपनी लड़की को दे दिया है आप मेरे परिवार का ख्याल रखोगे । मैं सोचता ही रहा कि जहां दुनिया में विश्वास खत्म होता जा रहा है वहां मेरे ऊपर इतना भरोसा करना ।  मेरी आंखों में आंसू आ गए मैं इतना ही कह पाया कि तुम्हें कुछ नहीं होगा । मगर उसने मेरे से हां कराई आपको बता दो वो दोस्त ईएसआई हॉस्पिटल नोएडा में काम करता है और मरीजों की सेवा में घर भी नहीं जा पा रहा ।  ऐसे दोस्तों को सलाम जो आज भी भरोसा करते हैं, दूसरों का इज्जत करते हैं । उस फोन के बाद मुझे ऐसा लगा कि जैसे बहुत बड़ी जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई । मैंने उसे भरोसा दिलाया पहले तो आपको कुछ होगा नहीं अगर होगा तो मैं भरोसा देता हूं आपके बच्चों का ख्याल रखूंगा । इस सच्ची घटना से ही मैं अपने विचार की शुरुआत करता हूं । दोस्तों आपको आज से काफी साल पीछे की जिंदगी में ले जाता हूं । देश की आबादी आज इतनी नहीं थी । ज्यादा स्वार्थ भी नहीं था, इंसान इंसान से मोहब्बत करता था । इंसान की आमदनी भी ठीक थी और खर्च भी इतना नहीं था । हमारी जरूरतें भी कम थी उस वक्त आपसी प्यार ज्यादा था और लोग स्वार्थी भी नहीं थे । आपस में मददगार का जीवन जीते थे । एक गली मोहल्ला भाईचारे का प्रतीक था लोग एक दूसरे की मदद कर खुश होते थे । आज जितनी जिंदगी की रफ्तार भी नहीं थी मैंने देखा किसी की आर्थिक मदद भी करनी होती थी तो कुछ लोग मिलकर कर देते थे और वो रुपया वापस भी नहीं मांगते थे । उधार नहीं मदद होती थी अगर उसी समय का वक्त फिर हमारी जिंदगी में आ जाए तो हमारा भाईचारा प्यार फिर से बढ़ जाएगा  और आज जो जिंदगी हम तनाव में जी रहे हैं फिर शांत माहौल में गुजरेगी । हम स्वार्थी भी नहीं रहेंगे हम सारी दुनिया की ना सोचे अगर हमने अपने आसपास रहने वालों के बारे में भी सोचना शुरू किया तो भी एक दिन ऐसा वक्त आएगा कि हर इंसान मजबूत और अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा हमारी छोटी सी मदद से । अगर हम किसी की मदद करने लायक हैं तो मदद भी कई तरह की होती हैं । अगर हम  धन से मदद नहीं कर सकते तो साथ खड़े हो ही सकते हैं अगर हम संपन्न हैं तो जो मदद हम कर रहे हैं  उसकी वापसी की उम्मीद ना कर हमें यह शब्द कहने चाहिए कि जब वापसी देने लायक हो जाओ तो पैसों से किसी और जरूरतमंद की मदद कर देना। फिर यह सिलसिला आगे चलता रहे । अगर इमानदारी से यह सिलसिला चला तो एक वक्त आएगा सभी लोग अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे । सब अगर अमीर नहीं तो भिखारी भी नहीं रहेंगे । आज जब मैं लोगों को जिंदगी जीते देखता हूं तो वह मददगार कि नहीं स्वार्थ की जिंदगी जी रहे हैं और शायद इसलिए ही हम धीरे-धीरे अकेले होते जा रहे हैं । समाज की रचना इसलिए हुई कि समाज यानी बड़ा परिवार और परिवार जब बड़ा होता है और हम मददगार बन जाए । जिसको भी जरूरत हो मदद की जरूरत हो तो सब मिलकर मदद करें तो हमें महसूस भी नहीं होगा और उसकी मदद भी हो जाएगी  और वह व्यक्ति गिरने से बच जाएगा वहीं दूसरी तरफ वह अपने पैरों पर खड़े होकर दूसरों की मदद भी कर पाएगा । हमारा आपसी सहयोग एक पुल की तरह है ब्रिज की तरह जो इंसान को आपस में जोड़े रहता है ।  जब छोटा था देखता हमारे यहां पास पड़ोस में कोई मेहमान आ जाए तो यह भी पता नहीं चलता था मेहमान हमारा है या पड़ोसी का सब मिलकर सत्कार करते और उसका आना बोझ भी नहीं लगता था । अगर आर्थिक मदद की बात होती तो भी आपस में मिलकर कर देते यह सब काम में मैं हिस्सेदार भी रहा। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ने लगे हमारी जरूरतें भी बढ़ने लगी तो हमारे अंदर स्वार्थ भी आ गया और हम स्वार्थी भी हो गए । मददगार की जगह हम स्वार्थी व फरेबी बन गये हम एक साथ रहना तो दूर आपस में हमारा विश्वास भी समाप्त होता जा रहा है । किसी दूसरे की तकलीफ में मददगार नहीं बल्कि उसको गिराने में लग जाते हैं । हमें दूसरों की खुशी से तकलीफ पहुंचने लगी हम अपने दुख से नहीं दूसरों की खुशी से दुखी हैं । आज करोना बीमारी की वजह से हम लोग अपने घरों में हैं । आज हम बिल्कुल फ्री हैं हम सोच तो रहे हैं मगर आगे बढ़ माफी मांगने की हिम्मत नहीं कर पा रहे कि हमसे गलती हो गई। आज जिंदगी जैसे थम सी गई मगर हम शांत हैं चुप हैं मगर मोह माया का त्याग नहीं कर पा रहे । कोई पहल करेगा मुझे उम्मीद तो नहीं फिर भी लिख रहा हूं । अगर  लोगों में भी जागरूकता आ जाए तो मेरा यह विचार  सार्थक हो सकता है । 

सरदार मनजीत सिंह 

आध्यात्मिक एवं सामाजिक विचारक




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