खुल्लम - खुला : यह दिन न भूला पायेंगे ! You will not forget this day!





                          खुल्लम - खुला

                                                               संजय त्रिपाठी

जिंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं जो कभी भूल नहीं पाता है। कहा जाता है कि हाईस्कूल तक हुआ पहला प्यार और संबंधी का दुत्तकार भी इंसान कभी नहीं भूलता। इसी तरह चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी के लगोटिया यार का धोखा और पत्नी की मार भी इंसान कभी नहीं भूला पाता। जिंदगी के यह लाॅकडाउन का समय और कोरोना वायरस का दिल में बैठा डर भी शायद कभी न भूले। ऐसे ही आज के समय में रोज - ब - रोज टीवी पर दिखाया जा रहा मजदूरों की आह और एक - एक कर उनके मरने की घटना भी नहीं भूलने वाली याद ही है। जीवन की कई ऐसी घटनाएं हैं जो समय के परत में दब तो जाती है, लेकिन उसे इंसान भूला नहीं पाता। असल में कुछ लोगों की यादास्त की क्षमता बहुत ज्यादा होती है तो कुछ में यह नगण्य पाया जाता है। लेकिन आम जनता में शायद यह नगण्य ही होती है तभी तो हमारे देश के नेता हर चुनाव में इन्हें चूना लगाकर साफ निकल जाते हैं और यह लोग दूसरी घटना के इंतजार में अपनी जीवन घसीटने लगते है। याद करें लाॅकडाउन का दूसरा चरण जब प्रवासी मजदूर सभी राज्यों में अपने रोजी - रोटी खत्म होने, भोजन न मिलपाने, हाथ का पैसा खत्म हो जाने, मकान मालिक द्वारा कमरा खाली करा देने जैसे तमामा कारणों से सड़क पर आ गए थे और अपने घर जाने के लिए छटपटाने लगे थे तो प्रशासन ने पहले उन्हें रोका, फिर खाना खिलाया और फिर भेड़ - बकरी के तरह उन्हें ले जाकर क्वारटाइन सेंटर के नाम पर उन्हें किसी स्कूल या जगह पर डाल दिया। इसी में कुछ लोग पैदल ही अपने घर के लिए निकल गए तो रास्ते में पुलिस ने उन्हें कहीं मुर्गा बनाया, कही डंडा बरसाया, कही धमकाया तो कहीं डांट - फटकार कर एक जगह से उठाया तो दूसरे जगह ले जाकर छोड़ दिया। उसी समय सभी राज्यों में अलग - अलग प्रवासी मजदूरों की वेदना भरी कहानियां सामने आई जो दिल को दहला गई। 

दूसरा और तीसरा चरण तो इन प्रवासी मजदूरों के लिए और भी दर्द भरा दिखा। मजदूरों के भारी जमवाड़ा और उतेजना को देखते हुए कुछ राज्यों ने कुछ बसें चलाई लेकिन सीमित बस और इनकी संख्या लाखों में जो ऊॅंट के मुंह में जिरा बन कर रह गया। गर्भवती महिला 1500 किमी की दूरी तय कर अपने घर पहुंचने से कुछ समय पहले ही बच्चें को जन्म देकर 24 घंटे के अंदर ही फिर मई की तपती दोपहरी में नवजात शिशु को गोद में लेकर घर के लिए निकल पड़ी। रामचरण पंड़ित दिल्ली के एक पुल पर बैठ कर अपने बीमार बच्चे की स्थिति फोन पर सुन कर सुबक - सुबक रोने लगे। किसी तरह कई प्रयास के बाद चार दिन में घर पहुंचे तब तक उनका बच्चा यह दुनिया छोड़ चुका था। इधर लोग 20 करोड़ के राहत पैकेज के बहस में इलझे हैं उधर मजदूर गिरते, पड़ते रगड़ते अपने घरों के तरफ पलायन करने में लगे है। अब स्पेशल ट्रेन भी चलने लगी है, लेकिन इन मजदूरों का पलायन रूकने का नाम नहीं ले रहा, साथ ही मरने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। ये मजदूर सिर पर गठरी लादे, बच्चों का हाथ पकड़े, पत्नी को साथ लिए चलते जाते हैं। कोई अपनी पीठ पर अपने बूढ़े पिता को ढो रहा है, तो कोई अपनी पीठ पर अपनी बूढ़ी मां को उठाए चल रहा है, किसी औरत की गोद में बच्चा है, तो कोई ट्रक पर लटकी रस्सी के सहारे अपने बच्चे को पीठ पर लादे लटक गया है, ताकि छत पर चढ़ सके। कल की औरया की घटना का मंजर आखों के सामने नाच रहा है। अब तक सौ से ज्यादा मजदूर लाॅकडाउन के काल के ग्रास बन गए है और सरकार की संवेदना सिर्फ राहत पैकेज बांटने में लगी है। आज भी यूपी दिल्ली, यूपी - मध्यप्रदेश, यूपी - उत्तराखण्ड बार्डर पर हाजारों की संख्या में घर जाने की उम्मीद में प्रवासी मजदूर जमे हुए है। क्या यह दृश्य जिंदगी के किसी मोड़ पर भूल पायेगा ? नेताओं की संवेदना तो मर ही गई है, इंसान की संवेदना भी कम नहीं मरी है। ऐसे मंजर के समय किस तरह मानवता डुगडुगी बजा कर प्रशंसा गीत गा रहा और किस तरह जयकारे लगा रहा है, यह उन दृश्यों से ज्यादा हृदयविदारक दृश्य बन गया है। सही में यह दिन न भूला पायेंगे !  

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