मजदूर एकता केंद्र के कार्यकर्ताओं ने मई दिवस का आयोजन किया Workers of Mazdoor Ekta Kendra organized May Day





  • सोशल मीडिया पर हैशटैग मईडेप्लेग्ड के साथ आयोजित किया अभियान


  • लॉकडाउन के दौरान सरकार द्वारा मजदूरों को पूरी तरह नजरअंदाज करने और धन्नासेठों के लोन माफ करने के लिए की कड़ी भर्त्सना 


  • गृह मंत्रालय के प्रवासी मजदूरों के लिए स्पेशल ट्रेन चलाकर उन्हें घर पहुंचाने का आदेश दिखाता है कि सरकार उनकी मूलभूत जरूरतों को पूरा करने में विफल है! मजदूरों की बड़ी जीत, उनके विरोधों के दबाव में सरकार को माननी पड़ी मांग


                                                          विशेष संवाददाता 

नई दिल्ली। आज मजदूर एकता केंद्र (डबल्यू.यू.सी.आई) कार्यकर्ताओं ने मई दिवस के अवसर पर कार्यक्रम और अभियान का आयोजन किया जिसमें बड़ी संख्या में मजदूरों और कामगार लोगों ने हिस्सेदारी निभाई। 
मई दिवस कार्यक्रम और अभियान का आयोजन विभिन्न माध्यमों से किया गया। जहां पर मजदूर काम पर हैं, वहाँ पर उनके बीच पर्चा  वितरण किया गया और इस मौके पर सोशल मीडिया पर हैशटैग मई डे प्लेग्ड के साथ अभियान चलाया गया। ज्ञात हो की आज देश में केंद्र शासित-भाजपा सरकार ने पिछले 6 साल में मजदूर विरोधी नीतियों को खुलेआम अच्छा बताकर लागू करती रही है। वो मौजूदा श्रम कानूनों जिनका अभी भी खुले तौर पर उल्लंघन होता है उनको लागू करने के स्थान पर नए कानूनों द्वारा, मजदूर अधिकार को पूरी तरह से खत्म कर देने पर आमादा है। पिछले 6 सालों में सरकार लगातार ‘मेक इन इंडिया’ जैसे जुमले उछाल कर मजदूरों को ठगती रही और उनका श्रम सस्ते दामों में देशी-विदेशी कंपनियों को बेचने के कानून बनाती रही है। सरकार का मजदूर-विरोधी चरित्र लॉकडाउन के दौरान पूरी तरह से उजागर हुआ है। 


ज्ञात हो कि इस महामारी के नाम पर थोपे गए लॉकडाउन के दौरान सरकार ने बहुसंख्यक मजदूरों को बिना किसी मदद के भूखों रहने के लिए छोड़ दिया है। सरकार द्वारा कोई यातायात की मदद न किए जाने के कारण अपने घर जाते हुए सैकड़ों प्रवासी मजदूरों की मौत हो चुकी है। जहां सरकार अमीर और अभिजात वर्ग के विदेश में फंसे लोगों के लिए स्पेशल हवाई चलवाती है, और कोटा में फंसे संभ्रांत वर्ग के छात्रों के स्पेशल बसें चलवाती है, लेकिन प्रवासी मजदूरों को घर पहुंचाने के लिए कोई मदद नहीं करती है। इन प्रवासी मजदूरों को बेहद ही गंदे शेल्टरों में ठूंस दिया गया है, जहां भारी-भीड़ है, और न ही पर्याप्त भोजन और साफ शौचालय है। आज ही में आए केंद्र सरकार के आदेश के अनुसार अब मजदूरों को स्पेशल ट्रेनों द्वारा उनके घर छोड़ा जाएगा, लेकिन लॉकडाउन के लागू होने के 1 महीने से भी ज्यादा यह आदेश आया है, और सरकार की मजदूरों की सभी जरूरतें पूरी करने में नाकामयाबी को दिखाता है। साथ ही, यह मजदूरों की जीत है, जिनके देश-भर में विरोध के कारण  सरकार को उनको घर पहुंचाने की मांग माननी पड़ी है।

हद तो तब हो गयी जब लॉकडाउन के बीच सरकार ने 20 अप्रैल को कंपनी मालिकों और उद्योगपतियों को मजदूरों को काम पर वापस बुलाने की छूट दी है, जबकि उच्च और मध्यम-वर्ग के लोग आराम से घर पर अपना समय बिता रहे हैं। साथ ही, विभिन्न राज्य सरकार कई कानूनों की आपातकालीन ताकतों का इस्तेमाल कर मजदूरों से 12 घंटे काम करने को मजबूर कर रही है। जहां मजदूर भुखमरी और तंगहाली से  बुरी तरह प्रभावित है जिसके लिए सरकार सिर्फ वादों के अलावा कुछ नहीं कर रही है, वहीं अमीरों और उद्योगपतियों के हजारों करोड़ के लोन माफ किए जा रहे हैं। मजदूरों के प्रति यह उदासीनता सरकार का मजदूर-विरोधी रवैये का पर्दाफाश करता है। 

मजदूर एकता केंद्र (डबल्यूयूसीआई) केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा मजदूरों का शोषण और उत्पीड़न और अधिक बढ़ाने पर कड़ी निंदा करता है, जिन्होंने पूँजीपतियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिए बेहद दमनकारी कदम उठाए हैं। वो मांग करता है कि सभी कामगार आबादी को 3 महीने के लिए न्यूनतम आय सुनिश्चित कि जाये, साथ ही, वो सभी मजदूरों और सभी जनवादी व प्रगतिशील संगठनों से आह्वान करता है कि वो मजदूर वर्ग और कामगार जनता के बढ़ रहे शोषण, उत्पीड़न और दमन के खिलाफ एकजुट संघर्ष के लिए आगे आयें।




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