यथा राजा तथा प्रजा Such as king and subjects






                                                                 रवि अरोड़ा

आज सुबह लगभग छः बजे का वक़्त था । गौशाला फाटक के निकट लगभग पचास-साठ लोग रेल की पटरियों के पास बैठे थे । पड़ोस में रह रहे मेरे एक मित्र ने जब उन्हें इस तरह संदिग्ध अवस्था में देखा तो वहाँ बैठने का सबब पूछा । इस पर पटरियों के निकट बैठे लोगों ने वह बात बताई जो बेशक मार्मिक थी मगर अब एसी बातें हम लोगों के मर्म को क़तई नहीं छूतीं । वे लोग दिहाड़ी मजदूर थे और जयपुर से यूँ ही रेल की पटरियों के साथ साथ पैदल चले आ रहे थे । बक़ौल उनके वे लोग बिहार के सिवान जिले में अपने गाँव जाना चाहते हैं । जयपुर से यहाँ तक पहुँचने में एकाध बार उन्हें थोड़ा आगे तक की किसी ट्रक में लिफ़्ट भी मिली मगर उनका अधिकांश सफ़र पैदल ही हो रहा है । ये लोग अभी वहाँ बैठे ही थे कि निकट की पुलिस चौकी के लोग उनकी ओर आने लगे । पुलिस को आता देखकर वे लोग फिर आगे बढ़ गए और जाते जाते मित्र को बता गए कि जहाँ भी पुलिस मिलती है उसका यही कहना होता है कि हमारे इलाक़े में मत रुको वरना जहाँ जाना है जाओ । 

अब आप कह सकते कि ये प्रवासी मज़दूर शायद बेवक़ूफ़ होंगे । उन्हें पता ही नहीं होगा कि सरकार उनके लिए क्या क्या कर रही है । उन्हें मुफ़्त राशन उपलब्ध कराने, उनके बैंक खाते में सीधा पैसा जमा करने के अतिरिक्त उनके लिए स्पेशल ट्रेन भी सरकार चला रही है । फिर क्यों ये लोग खामखां ही इतनी ज़हमत उठा रहे हैं ? मुझसे इस मज़दूरों की मुलाक़ात हुई होती तो सम्भवतः मैं उनसे यह बात पूछता अवश्य । ख़ैर पैदल सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र करने वाले श्रमिकों की कोई कमी तो आजकल है नहीं । यह बात किसी और से पूछ लेंगे । शहर के इस गौशाला फाटक से ही प्रतिदिन कम से कम डेड दौ सौ प्रवासी तो पैदल निकलते ही हैं । लोगबाग़ बताते हैं कि दो चार की संख्या में हों तो उन्हें कोई नहीं टोकता मगर अधिक संख्या में हों तो पुलिस दौड़ा लेती है । आज भी बड़े ग़्रुप वाले दो प्रवासियों के झुंड को जस्सीपुरा की ओर भगा दिया गया । थोड़ी देर बाद ये लोग पता पूछते पुछाते फिर कोट के पुल के पास नज़र आए और फिर पैदल ही अपने गंतव्य की ओर बढ़ गये । 

लॉकडाउन में रियारत की ख़बर मिलते ही अपने अपने घरों को लौटने वाले प्रवासियों की आमद सड़कों पर आज से अचानक बढ़ गई है । हालाँकि पहले लॉकडाउन के बाद से यह एक दिन भी नहीं रुकी थी मगर पुलिस-प्रशासन की सख़्ती से इनकी संख्या में बेहद कमी ज़रूर आ गई थी । आज डासना के निकट भी प्रवासी श्रमिकों के अनेक झुंड राजमार्ग पर पैदल जाते दिखे । शुरुआती दिनो में इन्हें देखकर लोगों की संवेदनाएँ जागृत होती थीं और लोगबाग़ इन पैदल यात्रियों को पानी की बोतलें , बिस्कुट और खाने के पैकेट भी दे रहे थे मगर अब इन समाजसेवियों का भी जोश ठंडा हो गया है और कोई मुँह उठाकर इनकी ओर देखता भी नहीं । अब हम भारतीयों की यही तो ख़ास बात है , परिस्थिति कोई भी हो हमें उसकी आदत बहुत जल्द पड़ जाती है । 

सवाल यह है कि काम की जगह पर तमाम सुविधाएँ मिलने के बावजूद ये लोग इतनी कष्टकारी यात्रा क्यों कर रहे हैं ? क्या यह ख़बरें दुरुस्त हैं कि फ़्री और सस्ता राशन केवल काग़जों में ही बँट रहा है ? पुख़्ता ख़बर तो यह भी है कि अधिकांश उद्योगों और काम धंधों ने भी बीस बाईस मार्च के बाद वेतन देने से हाथ खड़े कर दिए हैं । नतीजा श्रमिकों को भूखे मरने से अच्छा यूँ अपने घर जाते हुए सड़क पर दम तोड़ देना ज़्यादा उचित लग रहा है । मेरी यह बात सुनकर अब आप सारा दोष फ़ैक्टरी मालिक और काम धंधे वाले को ही मत देने लगना । अजी जनाब ये फ़ैक्टरी मालिक भी तो पक्के हिंदुस्तानी ही हैं । वे भी तो सोचते होंगे कि जब सरकार अपने कर्मचारियों का वेतन काट रही है और इन मज़दूरों को रेलगाड़ी से उनके घर छोड़ने का पूरा किराया भी वसूल रही है तो हम ही दानवीर कर्ण क्यों बनें ? अब यथा राजा तथा प्रजा वाली बात पूरी तरह किताबी भी तो नहीं है ना।


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