भूख और कुपोषण से हो सकती है बीमारी से भी ज्यादा मौतें Hunger and malnutrition can lead to even more deaths from disease






सरदार मंजीत सिंह 
लॉकडाउन रहा तो भूख से ज्यादा मौतें हो सकती हैं। आज मैं  नारायणमूर्ति के उस बयान को याद दिलाना चाहता हूं जिसमें उन्होंने कहा कि लॉक डाउन रहा तो भूख से ज्यादा मौत हो सकती हैं। देश की टॉप सॉफ्टवेयर कंपनियों में शामिल इंफोसिस के संस्थापक एन आर नारायणमूर्ति का कहना है कि देश में अगर लाॅक डाउन जारी रहा तो जितने लोग कोरोना वायरस की बीमारी से इनकी मृत्यु होगी उससे कहीं ज्यादा भूख और कुपोषण से मर सकते हैं। उन्होंने कहा ब्रिटेन जैसे विकसित देशों की तुलना में भारत के कोरोना के कारण मृत्यु दर काफी कम है। स्वस्थ व्यक्तियों को रोजगार पर लौटने वह अस्वस्थ लोगों की देखभाल हो वहीं दूसरी तरफ आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने अपने बयान में इस वक्त की आर्थिक तंगी की मार में सबसे ज्यादा पीड़ित गरीब तबके को बताया । यहां हमें मध्यमवर्ग को भी जोड़ना चाहिए । मध्यमवर्ग में जो निम्न आय वाले लोग हैं उन्हें हमें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए । हमारी सरकारों को भी मध्यम वर्ग के बारे में ध्यान देना चाहिए। मध्यमवर्ग ना तो अपने को गरीब कह पा रहा है और न अमीर ही। मगर जल्द ही वह सबसे ज्यादा पीड़ित वर्ग में होगा इसे मैं मानता हूं । भले ही मेरी बात ना तो सरकार को अच्छी लगेगी और ना ही मध्यम वर्ग के उच्च लोगों को, मगर फिर भी मैं बार-बार अवगत कराता रहूंगा । आरबीआई के पूर्व गवर्नर राजन के अनुसार आगे की अर्थव्यवस्था जल्द खोलनी चाहिए क्योंकि हमारे पास दूसरे देशों की तरह मजबूत व्यवस्था नहीं है। दोस्तों 22 मार्च 2020 से शुरू हुए लाॅकडाउन जो 3 नई से आगे बढ़ 17 मई तक हो गया  है । सरकार से फिर एक बार अपील करता हूं आप गरीबों की संख्या देश आबादी का 20 प्रतिशत मानते हैं जो शायद गलत है गरीब वर्ग की संख्या को 40 से 45 प्रतिशत मानकर चलें । कम आय वाले व्यक्तियों को भी इसमें जोड़ना होगा । करोना वायरस की वजह से मजदूर वर्ग भी पीड़ित है, जिसमें 40 प्रतिशत लोग अपने घरों को पलायन कर चुके हैं आज फिर उस तस्वीर को दोहराता हूं कि आज लाखों लाखों हर प्रदेश के नागरिक दूसरे प्रदेशों में फंसे हैं और भूख से पीड़ित है।ं जितना भी सरकार दावे करें हम भोजन दे रहे हैं मगर शायद पूरा नहीं कर पा रहे । दिल्ली में गुरुद्वारा कमेटी लगभग दो लाख लोगों की पालना कर रही है । कमेटी को मैं सलाम करता हूं । हमारे शहर को देखी तो कुछ समाजसेवी संस्था जुटी हैं मगर कितना सच का पता नही।ं अखबारों में तो बहुत सारी संस्था काम कर रही है अगर मैदान में उतर जाएं तो शायद हर गरीब का भला हो जाए । प्रशासन भी जुटा है कंट्रोल रूम भी खोल रखा है , मगर कितनी कामयाबी मिल रही है यह प्रशासन बता सकता है। मैं फिर भी सभी संस्थाओं का तथा प्रशासन का धन्यवाद करता हूं कि इस बुरे वक्त पर मदद के लिए आगे आए । आपको एक बात और ध्यान दिलाना चाहता हूं जो 40 प्रतिशत  मजदूर गांव की तरफ चला गया क्या वह लॉक डाउन खुलने के तुरंत बाद काम पर आ जाएगा शायद नहीं, शायद जल्दी में नहीं।  स्थिति सामान्य हो जाने में वक्त लगेगा तब तक जो मजदूर गांव चला गया उसका आना मुश्किल सा लगता है । लॉकडाउन खुलने के बाद स्थिति को सामान्य होने में वक्त लग जाएगा।  आज भले ही हम घरों में हैं हम अपनी पीड़ा किसी दूसरे को नहीं सुना पा रहे, मगर खुलने के बाद जेब में पैसा नहीं होगा खाते में पैसा नहीं होगा हो सकता है हम उस वक्त चिल्लाने लगे जोर जोर से । मेरे इस लेख से किसी को पीड़ा पहुंचती है तो मैं सॉरी बोलता हूं अपनी बात को समाप्त करता हूं इस उम्मीद के साथ सरकार मध्यमवर्ग की मजबूरी के बारे में भी सोचे ।  पूर्व गवर्नर राजन ने कहा गरीबों की मदद के लिए 65000 करोड चाहिए जो सरकार कर सकती है ।ं इसमें मध्यम वर्ग के गरीब भी जोड़ें जाने चाहिए ऐसा चाहता हूं । तब कितने हजार करोड़ चाहिए यह सरकार को सोचना है । 

सरदार मंजीत सिंह 

सामाजिक व आध्यात्मिक विचारक



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