गुरुदेव मानवता को सर्वोपरि मानते थे, वे ग्राम जीवन के पुजारी थे Gurudev believed humanity to be paramount, he was the priest of village life






गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर जन्मदिवस पर विशेष


नरेन्द्र कुमार शर्मा
सामान्यत: लोग रविंद्र रविंद्र नाथ टैगोर को केवल कवि या लेखक ही मानते हैं परंतु इसके अतिरिक्त गुरुदेव कवि कलाकार, चित्रकार, उपन्यासकार, कहानी, लेखक, समालोचक, संपादक, बाल साहित्य के रचयिता एवं भाषा शास्त्री के अलावा एक समाज सुधारक तथा एक सीमा तक राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे। यह अलग बात है कि उन्होंने राजनीति में सीधे-सीधे प्रतिभाग नहीं किया परंतु उन्होंने राजनीतिक हो अपने महान व्यक्तित्व से अलग भी नहीं होने दिया। गुरुदेव नाम से ख्याति प्राप्त रविंद्र नाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 कोलकाता के ठाकुरबाड़ी में महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर के यहां हुआ। इनके दादा पंडित द्वारका नाथ ठाकुर अति संभ्रांत व्यक्ति थे। यही कारण है कि रविंद्र नाथ को शिक्षा संबंधी सारी सुविधाएं प्राप्त हुई। इनके पिताश्री बहुत ही आध्यात्मिक एवं धार्मिक विचारों के व्यक्ति थे। अत : रविंद्रनाथ पर भी धर्म का बहुत प्रभाव पड़ा परमपिता की भांति यह भी धार्मिक कट्टरता हम ही नहीं थे पिता सोचते थे कि उनके बेटे सोम कुछ करने का सोचा परंपरावादी तक सीमित ना रहे स्वयं कुछ अलग से करना कि सोचकर रवींद्रनाथ पर बहुत प्रभाव पड़ा उनका बालमन एक स्वतंत्र अनौपचारिक प्राकृतिक शिक्षा में रम गया। 

बालक रविंद्र की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही विद्वान शिक्षकों द्वारा करा दी गई थी। अत्यंत मेधावी होने के कारण उन्होंने अपने शिक्षकों का पड़ा। सब कुछ रीजन गम कर लिया परंतु कुछ बड़े हुए तो इन्हें विधिवत पढने के लिए विद्यालय भेजा गया। परंतु विद्यालय का अनुशासनात्मक बंधनयुक्त वातावरण इन्हें नहीं भाया और उपचार इनके सहपाठी इनके स्तर के ही नहीं थे। मेधावी होने के कारण शिक्षक तो प्रसन्न थे परंतु इनके योग्य कक्षा में काम नहीं था रविंद्र राज कुंठित हो गए कि विद्यालय में न तो कोई ऐसी खिडकी या मंच जहां से वे उन्मुक्तभाव से बैठकर चिडियों को देख सके। पेड़ों का सर-सर आना, बादलों की आवाजाही अथवा एक स्थान से दूसरे स्थान तक भ्रमण यह सब कुछ वहां नहीं था। इसके विपरीत जो पाठ याद नहीं करते या नहीं कर पाते। उन्हें दंडित भी किया जाता था रविंद्रनाथ विद्यालय से लौटकर आने से रहने लगे उनके भाइयों ने जान लिया कि यह विद्यालय में पढ़ नहीं पाएंगे। इन्हें 13 वर्ष से 17 वर्ष की आयु तक घर पर ही विभिन्न विषयों की शिक्षा दी गई। संगीत मल्लविद्या तैराकी यह सब को बड़े चाव से सीखते रहे। बड़े भाइयों के साथ कविता गायन करते या गीत को संगीतबद्ध करते कभी घंटों गंगा में तैरते इनके बड़े भाई सत्येंद्र नाथ उस समय प्रथम भारतीय आईसीएस थे। इनके पिताजी तथा अन्य भाइयों की इच्छा थी की ये पढकर बैरिस्टर बने। अत: 17 वर्ष की आयु में इन्हें विलायत इंग्लैंड भेजा गया वहां एक अंग्रेजी परिवार के साथ रहकर इंग्लैंड के तौर तरीके एवं अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन किया। उसी दौरान अंग्रेजी लेखन में उन्होंने निपुणता प्राप्त की और बीच में ही ने भारत लौटना पड़ा। यहां इनके पिताजी ने इनकी जमीन जायदाद खेती बागवानी इनकी देखरेख के लिए नियुक्त कर दिया। इन्हें गांव को परिश्रमी ग्रामीणों को प्राकृतिक अंचल को निकट से देखने का समझने का अवसर मिला। इन्होंने पाया ग्रामीण व्यक्ति बहुत सीधी सरल प्रकृति के हैं। अज्ञानता के कारण अंधविश्वासों से रूढियों से जकड़े हुए हैं जितना परिश्रम करते हैं। बदले में कुछ नहीं पाते अथवा बहुत थोड़ा पाते हैं। इनकी रचनाओं में ग्रामीण पृष्ठभूमि प्रकृति नदियां कहानी किस्से सब का समावेश है। इन्होंने अपने कुछ कविताओं का एक संग्रह अंग्रेजी में गीतांजलि नाम से प्रकाशित कराया। इस संग्रह की भूमिका जाने-माने अंग्रेज कवि इट्स ने लिखी पहले तो भूमिका ही बहुत प्रभावी थी। फिर अंदर की कविताएं गीतांजलि ने रविंद्र नाथ की ख्याति दूर-दूर तक फैला दी। इसी गीतांजलि के कारण 1913 में उन्हें साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। रविंद्र नाथ टैगोर इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले न केवल प्रथम भारतीय थे अपितु एशिया के भी प्रथम व्यक्तित्व थे। टैगोर ने छोटे-बड़े कई उपन्यास अनेक कहानियां निबंध यात्रा वृत्त तथा लगभग 22 गीतों की रचना विशिष्ट शैली में की है। 

गुरुदेव ने इतिहास भाषा विज्ञान आध्यात्मिकता और प्रकृति से जुड़ी अनेक पुस्तकें लिखी हैं। नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के बाद ब्रिटिश शासक जॉर्ज पंचम ने गुरुदेव को नाइटहुड की उपाधि 1915 में प्रदान की परंतु उस सम्मान का गुरुदेव ने कभी उपयोग नहीं किया और 1919 में जलियांवाला बाग नरसंहार से शुद्ध होकर विरोध स्वरूप व सम्मान लौटा दिया। गुरुदेव के लिखे दो गीत आज दो देशों भारत वर्ष तथा बांग्लादेश के राष्ट्रगान हैं। यह इतिहास में मात्र अकेले उदाहरण है उन्हीं दिनों भारत का स्वतंत्रता आंदोलन तीव्र गति पर था महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन चला रखा था तो रविंद्र नाथ टैगोर ने उनका समर्थन किया। महात्मा गांधी और गुरुदेव परस्पर भक्त थे मित्र थे परंतु राष्ट्रवाद और मानवता पर विचार अलग-अलग थे। गांधीजी राष्ट्र को सर्वोपरि मानते थे गुरुदेव मानवता को सर्वोपरि मानते थे। मानवता के कारण ग्रामीणों के भोलेपन के कारण ग्राम में अशिक्षा के कारण गुरुदेव ने एकदम ग्रामीण अंचल में एक विद्यालय शांतिनिकेतन की स्थापना की जो बाद में विश्व भारती विश्वविद्यालय नाम से जाना जाता है। यहां के अधिकांश छात्र सफलता के शिखर पर पहुंचे हैं। इनमें सत्यजीत राय, अम्र्तयसेन, इंदिरा गांधी, अवनींद्र टैगोर, नंदलाल बोस, सावित्री देवी, केजी सुब्रमण्यम, सुचित्रा मित्रा, तान युन शान, विनोद बिहारी मुखर्जी, कणिका बंदोपाध्याय तथा गुरु केलानायर प्रमुख हैं।

नरेन्द्र कुमार शर्मा

राष्ट्र पुरस्कृत शिक्षक


Share on Google Plus

0 comments:

Post a comment