खुल्लम - खुला : पीता हूं गम भुलाने को





                                                                    संजय त्रिपाठी 

लाॅकडाउन में शराब का सरकारी व प्राइवेट ठेका खुलने के बाद बहस छिड़ गया है। सब अपनी - अपनी नजरिए से इसकी व्याख्या कर रहे हैं। मैं भी सोचा कि इसकी व्याख्या मैं अपनी नजरिए से भी कर दूं। हालांकि मेरी व्याख्या पर मेरे मिलने वाले व मेरे साथी ही खिल्ली उड़ायेंगे। फिर भी मैं कर ही रहा हूं। कई ऐसे पोस्ट चल रहे हैं कि किताब - काॅपी की दुकान बंद कर, शराब का ठेका खोल दिया गया। ऐसा कौन कर सकता है ? प्रश्न तो जायज है और इसका उत्तर दिया जा रहा है कि ऐसा अनपढ़ ही कर सकता है। जिस दिन मैने भी एक पोस्ट फेसबुक पर शेयर किया तो कुछ सुलझे हुए, देशभक्तों की लहर से में हिलोरे मारने वाले मुझे ट्रोल करना यानी खींचना शुरू कर दिए। पहले तो मैं सकपका गया, फिर लगा कि मैं कोई गलत पोस्ट नहीं डाला हूं, जायज है और इस पर अड़ा रहूंगा। हालांकि अभी तक इस पर काॅमेंट झेल रहा है। लेकिन यह तो मानना ही पडेगा कि हमारे भारत देश में सोमरस की महिमा ही न्यारी रही है। कहा जाता है कि पहले यह भारत में ही था जिसे देवता लोग और हमारे पूर्वज ही सेवन करते थे । बाद में विदेशियों ने गुलामी के दौरान या आक्रमणकारियों ने आक्रमण के बाद हमारी पद्धति को हमेसा के लिए  अपना लिया। महान कवि हरिवंश राय बच्चन ने भी मधुशाला में शराब की उन बारिकियों को उकेरा है जो दिल को हाला के समान ही मस्त कर देता है। आज हमारा समाज जिस मुद्दे पर जूझ रहा है उसे उन्होंने वर्षो पूर्व कह कर हमे एहसास करा दिया था। याद हो आपको भी - बैर कराते मंदिर - मस्जिद, मेल कराती मधुशला। सब लोग शराब की दुकान खुलने पर हंगामा मचा रखे हैं इनमें पीने वाले और शराब के लिए लाइन में लगने वाले भी पीछे नहीं हैं। हमारे देश में ही इसे हूर की परी, अंगूर की परी जैसे कई नामों से पुकारा जाता है । ऐसे नाम दुनिया में कहीं भी संभव नहीं है। तभी तो मशुशाला का संपादकीय लिखने में संपादक ने कहा है कि - ‘ बच्चन की मदिरा चैतन्य की ज्वाला है, जिसे पीकर मृत्यु भी जीवित हो उठती है। उसका सौंदर्य - बोध देश - काल की क्षणभंगुरता को अतिक्रमण कर शाश्वत के स्पर्श से अम्लान एवं अनन्त यौवन है। यह निस्सन्देह बच्चन के अन्तरतम का भारतीय संस्कार है, जो उसके मधु - काव्य में अज्ञात रूप से अभिव्यक्त हुआ है। बच्चन की मदिरा गम गलत करने या दुख को भुलाने के लिए नहीं है, यह शाश्वत जीवन - सौन्दर्य एवं शाश्वत प्राणचेतना - शक्ति की प्रतीक है। ’  अब सोचे जो प्राचीन काल से राजनीति व अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा रहा हो उसे कैसे कोरोना काल में अपने से अलग कर दिया जाए। जिस दिन मधुशाला खुला उसी दिन एक मस्त ने अपने गाड़ी से दिल्ली में चार लोगों को कुचल दिया। कोरोना असर करता या नहीं, लेकिन इसने अपना असर खुलते ही शुरू कर दिया। लाॅकडाउन में सभी राज्यों केी कमर टूटती जा रही थी। एक तो कोरोना में खर्च अलग से बढ़ रहा था, उसी में लोगों के घर राशन और नगद पहुंचाने का दबाव भी सरकार के ही सर पर था, जबकि जहां से गुदड़ी के लाल निकलना है वह तो बंद है। फिर राज्य सरकारें ऐसे में क्या करें। राज्य सरकारों को कमाई का एक बड़ा हिस्सा शराब पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी से आता है। 2018 - 19 में उत्तर प्रदेश को इससे 25 हजार 100 करोड़ रूपया और 2019 - 20 में 31 लाख 51 हजार 741 करोड़ रूपए की आमदनी हुई थी। क्या यह आमदनी खत्म हो जाने के बाद आप खैरात बांट पाओगे। आज खुल गया है तो आधे लोग मस्ती में झुम रहे हैं और उन्हें खाने - पीने जैसी किसी चीज की चिंता नहीं है। खूब पीओ और मौज से जिओ । राम - राम 


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