खुल्लम - खुला : बिहार में बहार है





                                                       संजय त्रिपाठी 

आपको भी याद होगा - ‘ बिहार में बहार है, नितिशे कुमार है। ’ मैं तसे अभी तक नहीं भूला और जल्दी भूलुंगा भी नहीं। आप भी इतना जल्दी न भूले, बिहार वालों को तो भूलना ही नहीं चाहिए। आज मुझे बिहार के ही भोजपुरी के प्रसिद्ध अंजन कवि की एक पंक्ति याद आ गई - ‘ जवना दियना में तेलवा ओरा गइल बा, ओकर बतिहर जरावला से का फायदा। ’ आज बिहार का भी वही हाल है। हम लोग प्रचाीन इतिहास की बातें पढ़ - पढ़ कर खुब खुश होते है। कुछ लोग हम बिहारी लोगों को पुरानी बातों का कसीदा काढ़ कर हमें गदगद कर देते हैं। हमें गदगद होने की पुरानी आदत जो है। वहां के लोग ही कहते हैं कि पूरा देश संविधान से चलता है, लेकिन बिहार मन की विधान से चलता है। जरा सोचे मोदी जी ने वहां के परेशानी को ध्यान में रखते हुए घर - घर शौचालय बनवा दिया। ओरत, मर्द और बच्चे गांव व घर से बाहर जाने के वजाय शौचालय का प्रयोग करें लेकिन आज भी बिहार के 60 प्रतिशत लोग बाहर ही जाते हैं। उनका कहना है कि घर के अंदर के शौचालय में उनकी शौच ही नहीं उतरेगी। अब बताओं मोदी जी और क्या कर सकते हैं। वहां बरसात में लोग खेतों में कम ही जाते हैं सड़क किनारे ही उनके लिए शौचालय होता है। अब तो यही हाल सर्दी और गर्मी में भी हो गया है। अगर सड़क पर साईकिल या पैदल जा रहे हो तो देख कर ही चलाना पड़ेगा वह भी सड़क के बीचोबीच ं जरा सा भी इधर - उधर हुए तो हुआ आपका कल्याण। फिर खोजते रहो रास्ते में पानी। बीचोबीच में भी जब कोई वाइक या गाड़ी आ गई तो धीरे से बच कर किनारे के तरफ ही पैर रखना पड़ेगा। गांव वालों के लिए सड़क पर उनका राज और वाइक तथा गाड़ीवालों के लिए सड़क मेरे बाप का । सरकार के प्रशासनिक तंत्र का आधा समय तो इसी के फैसले में निकल जाता है और जो आधा बचता है वह वसूली या जी - हुजूरी में निकल जाता। वहां के नेता भी आजादी के बाद से ही मनमौजी रहे। सभी प्रदेश अपना विकास कर रहा था तब बिहार में रेलगाड़ी ही अपने घर में लाने की बात चल रही थी। याद करे बिहार के रेलमंत्री बाबू जगजीवन राम को। कहा जाता है कि अगर उनके घर तक रेल की पटरी होती तो अपने घर रेलगाड़ी ही उठा लाते। याद करें एक और मंत्री को जो नगद नारायण के नाम से विख्यात हो गए। हां, जयप्रकाश नारायण ने कुछ ऐसा काम किये जिससे बिहार का गौरव बढ़ा। जब पूरा देश विकास के क्षेत्र में सरपट भाग रहा था उस समय बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुद हिन्दी - अंग्रेजी के खेल में लगे थै। पहले हाईस्कूल और इंटर में अंग्रेजी को पास कोर्स से हटा कर अलग किया बाद में छिछालेदर होने के बाद फिर अंग्रेजी पास कोर्स में शामिल किये। एक मुख्यमंत्री थे जिन्होंने छात्रों पर गोली चला कर एक नया नारा गढ़वाया - छात्रों पर गोली कौन चलाया - यही गफ्फूर - यही गफ्फूर । उसके बाद तो बिहार में अन्य उधोग तो बंद होने लगे और अपहरण उधोग की बहार आ गई। उधोगपति लेवी और दबंगी टैक्स देने के जगह अपना उधोग ही समेटने लगे। पहले शुयआत में बिहार में भी उधोग विकसीत हुआ, लेकिन राजनताओं, नेताओं ओर ब्यूरोक्रेट की मेहरबानी से जल्दी ही धराशाही हो गया। फिर तो जोकरों का उदय हुआ जो अपने हावभाव और छाव से बिहार को विश्व में प्रसिद्ध कर दिया। सारा मलाई खा गये और बिहारवायिों को हंसने और गदगद होने के लिए छोड़ गए। फिर उदय हुआ शंकर जी महाराज का। जिन्होंने समुन्द्र मंथन से निकला सारा विष पी कर अपना कंठ नीला कर लिया और अपना नाम रखवाया - निलकंठ। उनका कंठ निला है और इनकी आंख निली हो गई है। इन्होंने लोगों से कहा - हे  ! बिहार के खुशमिजाज मेहनतकश, तकदीर बदलने वाले योद्धा इस कोरोना काल में धीरज धारण करें और जो जहां हैं वहीं शाति से अपने घर के अंदर पड़े रहे। जैसे ही लाॅकडाउन खत्म हो जायेगा बिहार सरकार वहां के सरकार से बात कर आपकी नौकरी, ठेली, पटरी, खोखा, रिक्शा के लिये व्यवस्था करा देगी। आप चिंता न करें । ऐसे समय में देश का साथ दें। अगर आपके पास खाना - पैसा खत्म हो गया है तो वहां के सरकार के भंण्डारे या कोष से लाइन लगा कर ले ले, क्सोंकि बिहार सरकार के पास उतना साधन नहीं है जो आपकी वहां व्यवस्था करा सके या आपको वापस बुला सके। यहां तो सिर्फ 6 सौ बस ही है फिर  ऐसे में लाखों लोगों को कैसे लाया जायेगा ? बस आप चिन्ता न करें, अगली बार के चुनाव में एक बार फिर नितिश को लाये जिससे वो ज्यादा बस का इंतजाम कर सकें और 2024 में मोदी को जिताए जिससे हमारी सरकार चल सके।  भगवान सबका अच्छा करेगा आप चिंता न करें। राम - राम जी! 


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