संपादकीय: नफरत का जहर Poison of hate






आज हवाओं में नफरत का जहर घुलता जा रहा। मानव - मानव का दुश्मन बन गया है। इंसानियत अब इतिहास की बातें रह गई है। फिजा में नफरत का जहर घोला जा रहा। सोशल मीडिया का इसमें अहम भूमिका है। यह कोई एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि वर्षो से यह जहर घोलने का काम किया जाता रहा है और आज वह समाज व देश को जहर के आगोश में लेता जा रहा। कोरोना से लोग सामाजिक दूरी बना रहे है और इस नफरत का जहर देश में धार्मिक दूरी बनाने पर जोर दिया है। हालांकि कोरोना काल में यह जहर अपना प्रभाव ज्यादा ही दिखा रहा या यह कहे कि इसके माध्यम से इस जहर को फैलाने का कुछ लोगों को मौका ज्यादा मिल गया जो पहले से ही इसकी तैयारी करके बैठे हुए थे। जिस तरह एक धर्म विशेष को कोरोना का वाहक बता कर कई तरह की अफवाहे फैलाई गई, एक - दूसरे के जीवन यापन पर कठोराघात किया गया, समाज में एक धर्म के व्यक्तियों के प्रति अविश्वास भर दिया गया वह अब जल्दी खत्म होने वाला जहर का असर नहीं है। कोरोना तो आया और एक दिन चला भी जायेगा, लेकिन यह अविश्वास की दूरी कैसे समाप्त होगी ? जरा सोचे जब भारत में कोरोना ने दस्तक दिया, तब भी कई बड़े आयोजन हुए, सरकार गिराई गई और बनाई गई, नमस्ते ट्रप जैसे बृहद आयोजन सफल हुआ जिसका नतीजा अब गुजरात में दिखाई दे रहा कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, लेकिन उसी समय निजामुद्दीन मरकज में तब्लीगी जमात का आयोजन जो गृह मंत्रालय तथा पुलिस के अनुमति से किया गया था उस पर सबसे ज्यादा दोषारोपण किया गया। यह हल्ला - जोरशोर तब मचा जब आधी रात्रि को एक ब्यूरोक्रेट के मरकज जाकर बाहर आने की जानकारी आम हुई। देश के चैनलों के लिए एक ऐसा मसाला मिल गया जो उनके टीआरपी तो बढ़ाया ही, बल्कि लंबी दूरी तक बरकरार भी रखा। 
हां इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि देश में कोरोना को बढ़ाने में तब्लीगी जमात का बड़ा हाथ है। सरकारी आंकडे़ के अनुसार तब्लीगी जमात के कारण करीब 33 फीसदी मरीज बढ़े हैं। कई जगह मुस्लिम समुदाय द्वारा चिकित्साकर्मियों व सुरक्षाकर्मियों पर हमला भी किया गया। बार - बार कहने के बाद भी जमात से जुड़े लोग बाहर आकर अपनी जांच नहीं कराये, बल्कि कुछ लोगों का वीडियो भी सामने आया कि कोरोना पांच वक्त नमाज पढ़ने वालों का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वास्तविक में यह मुर्खता की पराकाष्ठा ही कही जायेगी, फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि कई ऐसे कारण होते है जिससे ऐसी स्थितियां पैदा होती है। जिस समय जमात को लेकर चैनलो व सोशल मीडिया पर हो - हल्ला मचा था उस समय कुछ ऐसे मामले या वीडियो सामने आये थे जिससे जमातियों में एक डर की भावना पैदा हो गई थी और वह डर ही कई ऐसे कारणों को जन्म दिया जिससे कुछ ऐसी घटनाएं सामने आई जो नहीं होना चाहिए था। लेकिन इस कोरोना के आड़ में जिस तरह का खेल शुरू हुआ वह एक बड़े वर्ग में एक समुदाय के प्रति नफरत का जहर भरता जा रहा । जिस तरह आज सुबह से शाम तक सोशल मीडिया पर एक समुदाय के खिलाफ जहर उगला जा रहा, उसके द्वारा किया जा रहा हर कार्य को फर्जी या सही यह तो जांच का विषय है दिखाया जा रहा वह अविश्वास तो पैदा कर ही रहा है। एक समुदाय से सब्जी मत खरीदो वह इस पर थूक लगाता या पेशाब करता, फल पर पेशाब का पानी छिड़कता। नाई से बाल व दाढ़ी न बनाओं व चेहरे पर थूक लगाता ऐसे वीडियों का आज सोशल मीडिया पर भरमार है। इसी का नतीजा है कि आज कल सब्जी - फल बेचने वाले जो ठेली लेकर घूम रहे है वे देवताओं के टी -शर्ट पहन रहे, गले में केसरी रंग का गमछा डाल रहे या ठेली पर केसरिया झंण्डा लगाकर हिन्दू होने का प्रमाण दे रहे है। जमशेदपुर में भी दो फल की दुकानों पर विश्व हिंदू परिषद अनुमोदित हिंदू फल की दुकान लिखने को लेकर सोशल मीडिया पर हंगाम मच गया। हालांकि पुलिस ने ऐसा झंण्डा हटवा कर कानूनी कार्रवाई भी की है। इसके बाद से ही सेशल मीडिया पर जोर - शोर से यह मामला चल रहा है। क्या यह एक स्वच्छ समाज के लिए सही दशा और दिशा है। अगली पीढ़ी को हम क्या दे रहे एक बार इस पर गहन चिंतन की जरूरत है। जब समाज बिखर जायेगा तों कुछ भी किसी को हासिल नहीं हो पायेगा, क्योंकि जो दूसरे के लिए गड्ढ़ा खोदता  वह स्वंय ही उसमें गिरता है। 



Share on Google Plus

0 comments:

Post a comment