खुल्लम - खुला : ये दिन भी देखना पड़ा ? Had to see this day too?





                                                   खुल्लम - खुला


                                                                   संजय त्रिपाठी

कभी सोचा नहीं था कि बुढ़ापे से पहले इस कदर धरेलु चिक - चिक से दो चार होना पड़ेगा। आज कैसे - कैसे दिन देखने पड़ रहे। जो कभी नहीं सुना वह सुनना पड़ रहा। बाहर जाओ तो कोरोना का डर और अंदर रहो तो दिन भर रोना का डर। आखिर आदमी जाये तो जाये कहां ? कभी - कभी तो ऐसा लगता है कि बाहर जाया जाएं, कोरोना को झेल लेंगे लेकिन उसके मां को झेलना बहुत ही मुश्किल हो रहा। अब तक सब कुछ था, लाख परेशानी होती, कई तरह के मुश्किल आते रोज चिक - चिक से भी दो चार होना पड़ता लेकिन गम नहीं होता था, क्योंकि अधिक से अधिक एक - दो घंटे का ही चिक - चिक झेलना पड़ता था। आज इस कलमुंहे कोरोना के चलते 24 घंटे की चिक - चिक सुनना पड़ रहा। मेरे जैसे तो भगवान से प्रार्थना कर रहे कि हे प्रभु कोरोना को भेज दो लेकिन इस रणचंण्डी से मुझे मुक्ति दिलाओ। या तो मुझे कोरोना पकड़ा दो या इसे कोरोना से भगा दो। शांति तभी है, परेशान दिल और मन को शकुन तभी है, अंतरआत्मा सुखी तभी हो सकती, ईश वंदन तभी हो सकता। खाली अगरबत्ती जलाने से कोई फायदा नहीं लगता। ऐसा लगता है समय रहते खाप पंचायत वाले भी सचेत हो जाएं, जिसे तुम गड़ासा से काटने, पेड़ पर टांगने, गला दबाने आदि के माध्यम से समाप्त करने की कोशिश करते रहे हो, अब सचेत हो जाओ। शंकर जी के तरह इनका कालि अवतार को कोई और नहीं थाम सकता। कोरोना काल में इन्हें देखते ही ऐसा लगता हैं कि  चारो ताफ अंधेरी काली रात के तरह एक बिकराल काली मां लाल-लाल आंखें ,, गले में मुंडो की माला, गज भर चटक लाल जीभ निकला हुआ, पीछे हिलोरे खाते हुए लंबी बाल, एक हाथ में जलता खप्पर, दूसरे हाथ में तलवार और उससे दुष्टों का संहार करती आगे बढ़ रही हैं काली मां। ंमेरे जैसे लोग कोरोना से ज्यादा घर में इस भयंकर रुप को देखकर सांस रोक रखे है। मोदी जी मन की बात में आते और बिना किसी की कुछ सुने अपनी कह कर चले जाते। कम से कम उनका तो ख्याल रखे या उनके लिए कोई तो उपाय बताये जो ऐसे समय में उनकी आज्ञा का पालन करते हुए अपने घर में रह कर कोरोना के जगह रणचण्डी का सामना कर रहे। कम से कम हे देव उसके लिए तो कोई उपाय बताये। लगता है नहीं बतायेंगे। कम से कम मेरे जैसों पर दया करें, कम से कम उनका भी कोई बचाव का रास्ता निकाले जिससे वह घर में शांति से रह सके। लेकिन लगता है कि आप मेरे जेसों की कोई सहायता नहीं करेंगे। कहा गया है - खग जाने खगही की भाषा। आज जब लाॅकडाउन में घर में रहते हुए जब भी कभी खाली समय में चिक - चिक से दूर होता हूं तो मुझे गांव के बचपन का वह समय याद हो जोता है जब रोज सुबह - सुबह, कभी रात को भी दो पडोसियों के रणचंण्डी रुप को देखा जाता था। बचपन में इसे देखने और चुहल करने में बड़ी मजा आती थी, लेकिन जब आज वह रुप अपने सामने आ रहा तब पता चलता है कि इन्हें झेलना कितना मुश्किल है। करीब रोज सुबह जब अभी - अभी उठे होते  या कुछ ही समय निकला होगा मेरे घर के पश्चिम दिशा में दो पड़ोसियों के यहा महाभारत शुरू हो चुका होता। शब्दों के बाण ऐसे होते जो बड़े - बुजुर्गो को कान दबा कर भागने पर मजबूर कर देते। हमारे जैसे लड़के और कुछ युवाओं को ठिठोली करने के लिए अच्छा मसाला जुट जाता। कई बार तो ऐसा रुप देखने को मिला है जो रणचंण्डी को भी शर्मिंदा कर देगा। दोनों के दीवार के बीच में नाला और नाले के बीच में दो सुरमाओं को बाल पकड़ कर मल्ल - युद्ध की आप कल्पना करें। एक रूप, एक आवाज और एक ही तरह के शारीरिक बनावट आज भी वह दृष्य आंखों के सामने घूमता है। जब वहीं रुप घर में बैठे - बैठे दिखाई देता है तो आज भी दिल दहल जाता है। हे कोरोना देवी रहम करो, ताकि लाॅकडाउन खत्म हो और मेरे जैसों को कुछ शकुन मिले। भले आप की कृपा दृष्टी से ना मरे लेकिन धर की कृपा दृष्टी से जरूर मर जायेंगे।    

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