संपादकीय : भय और भूख Fear and hunger





                                                          संजय त्रिपाठी 

पेट की भूख कोरोना के भय पर भारी पड़ रहा। मजदूर वर्ग आज निरीह प्राणी सा बन गया है। गांवों, कस्बों से शहर में आकर जीवन - यापन करने वाला ठेली - पटरी, खोंमचे वालो पर लाॅकडाउन का बढ़ता दायरा कोरोना के भय से ज्यादा भयभीत कर रहा। बीमारी के भय पर उनकी भूख भारी पड़ रहा। सरकारी दावे उनके लिए खोखला नजर आ रहा । पिछला 21 दिन का लाॅकडाउन और बाद में उन्नीस दिन की बढ़ोतरी से एक बार फिर प्रवासी मजदूरों का धौर्य जवाब दे दिया। मुंबई, ठाणे, सूरत और दिल्ली में कई जगह हजारों की संख्यां में मजदूर सड़क पर उतर आये और एक बार फिर घर जाने लगे। उनका कहना था कि उनके पास खाने - पीने का कुछ नहीं है, इसलिए उन्हें घर जाने दिया जाए। हर जगह यही स्थिति देखने को मिली, लेकिन मुंबई के बांद्रा स्टेशन पर एक समय में हजारों की संख्या में यूपी, बिहार, उड़ीसा, राजस्थान के हजारों प्रवासी मजदूर इक्टठा हो गए। लाॅकडाउन का पहला चरण समाप्त होने के बाद किसी ने सोशल मीडिया पर अफवाह फैला दी थी कि मुंबई के बांद्रा स्टेशन से विशेष गाड़ियां चलने वाली हैं, जो घर लौटने के इच्छुक लोगों को ले जाएंगी। इससे बड़ी संख्या में लोग बांद्रा स्टेशन पर जमा हो गए। इस तरह लाॅकडाउन में सुरक्षित दूरी बना कर कोरोना के चक्र को तोड़ने का इरादा बाधित हुआ। 
बांद्रा स्टेशन की घटना को लेकर अफवाह फैलाने के मामले में पुलिस ने वहां की एबीपी मांजा चैनल के एक रिपोर्टर राहुल कुलकर्णी को गिरफ्तार किया है, दूसरी तरफ प्रवासी मजदूरों को आंदोलन के लिए भड़काने के लिए विनय दूबे नामक एक व्यक्ति की भी गिरफ्तारी की गई है। हालांकि मजदूरों के भीड़ को देखते हुए प्रशासन के हाथ - पैर फूल गए थे। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को भी समझाना पड़ा और उन्हें कहना पड़ा कि वे किसी भी तरह की चिन्ता न करें उनके भोजन आदि की व्यवस्था की जायेगी। हर प्रदेश में प्रवासियों के लिए भोजन व उनके रहने की व्यवस्था सरकार के स्तर पर की गई है, उनके ठहरने के लिए कई स्कूलों व सेल्टर होम में केंद्र बनाई गई है फिर भी प्रवासी मजदूरों में सरकारें भरोसा पैदा नहीं कर पा रही हैं, आखिर क्यों ?
यह प्रश्न तो सामने हैं ही लेकिन जो सच दिख रहा है उससे भी इंकार नहीं किया जा सकता। हकीकत यह है कि सभी तक पर्याप्त भोजन नहीं पहुंचाया जा पा रहा। बहुत सारे लोगों को आधा पेट खाकर या फिर कई दिन भूखे रह कर गुजारा करना पड़ता है। मुफ्त राशन बांटने वाले केंद्रों पर दिन भर लंबी कतारें देखी जाती हैं। कई ऐसे वीडियो सामने आ रहे है जिसमें उनको खाने को समय से नहीं मिल पा रहा साथ ही भोजन के तलाश में जब वे घर से बाहर निकल रहे हैं तो उन्हें पुलिस की लठ से भी स्वागत की जाती है। कल ऐसे ही एक युवक की वीडियों हमारे एक पत्रकार साथी ने अपने फेसबुक पर डाली थी। इन मजदूरों के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि उनके काम - धंधा बंद हो गया है, आगे यह कब शुरू हो पायेगा यह कोई निश्चित नहीं है। एक तरफ काम शुरू होने की अनिश्चितता और खैरात के भोजन से कितने दिन गुजारा हो पायेगा इससे वे घबड़ाये हुए हैं। उन्हें लगता है कि अपने गांव पहुंच कर वे निश्चिंत हो जायेंगे। ऐसी स्थिति में मुंबई जैसा कोई अफवाह फैलता हो तो उनको घर जाने की उम्मीद ज्यादा बढ़ जाती है और वे अपने साथ मोटरी - गठरी और बच्चे लेकर निकल पड़ते हैं। 
हालांकि मुंबई के बांद्रा स्टेशन की घटना कई प्रश्न पैदा कर रही है। एक तरफ इतने लोग एक जगह और एक समय पर कैसे इक्टठा हुए। इसके लिए कहा जहां रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी का देश के नाम संबोधन खत्म होने के बाद एबीपी मांजा ने खबर चलाई कि बांद्रा स्टेशन से जन साधारण एक्सप्रेस चलाई जा रही है। दूसरा मामला सामने आ रहा है कि टिकट भी कटना शुरू हो गया था। खबर चलाने वाले चैनल के रिपोर्टर का दावा है कि रेलवे द्वारा एक विभागीय पत्र जारी किया गया है जिसमें प्रवासी मजदूरों के लिए ट्रेन चलाने की जिक्र की गई है। दूसरी ओर विनय दूबे नामक व्यक्ति का एक वीडियों सामने आया है जिसमें वह स्टेशन पर इक्टठे मजदूरों को भड़का रहा है। हालांकि इस घटना में भी स्टेशन के पास की मस्जिद को भी एक एंगल से शामिल करने का प्रयास किया गया है। इन सभी मुद्दों की जांच की जा रही है। किसी न किसी दिन सच्चाई तो सामने आयेगी, लेकिन जिस तरह की घटनाओं की पुरर्रावृत्ति बार - बार हो रही है यह लाॅकडाउन तथा कोरोना वायरस के मध्येनजर सही नहीं कही जा सकती। केंद्र और राज्य सरकारों को इस मुद्दे पर ज्यादा सजग होने की जरूरत है। 




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