खुल्लम - खुला : हद कर दी आपने !





                                                        संजय त्रिपाठी

कोरोना वायरस सही में ऐसा वायरस है जो थ्री इडिएट के वायरस को मात दे रहा। को - रोना यानी को - कष्ट, कष्ट देने वाला, जानना , सताना, छोड़ कर के साथ रोना। को का शाब्दिक अर्थ है कष्ट देने वाला तभी तो इसका नाम को - रोना पड़ा है। यह कष्ट देकर हमें , हमारे देश को और देश के कर्णधारों को रोने पर विवश कर देगा। सिर्फ देश ही नहीं पूरा विश्व आज उसी स्थिति से जूझ रहा हैं। जब मैं गाजियाबाद में आया था तो शुरू में यहां के अर्थला गांव में अपने गांव के लड़कों के साथ रहता था और टाटा आॅयल मिल्स लोनी रोड़ में साबून पर रेपड़ लगाने का काम करता था। हालांकि उस समय भी अपनी शिक्षा जारी रखी थी, लेकिन गांव से आने के कारण ज्यादा फिल्म देखने का मौका नहीं मिला था। 

पहली फिल्म मेरा गोपालगंज जनता टाॅकिज में ‘ द ग्रेट गैम्बलर ’ था। हमारे एक साथी और रिश्ते में कुनबे के बड़े भाई बागेश्वर तिवारी उस समय नया - नया धनबाद से गांव आये थे। उन्हें फिल्मों का बहुत ज्ञान था। उनके चाचा के बड़े लड़के मंकेश्वर तिवारी भी हमारे तरह गांव में ही रह पढ़े इसलिए वे भी फिल्मों के विषय में नहीं जानते थे। उस समय मेरी भी इच्छा गांव से बाहर जाकर नौकरी करने की होती थी। यह घटना 1984 की है जब हम लोग हाईस्कूल के बोर्ड़ का पेपर देकर निकम्मा हो गये थे। मेरे शरारत के कारण मेरे पिता जी मुझसे गुस्सा रहते थे। मैं भी उनके गुस्सा से खुली छुट में था और रोज गांव से शहर में जाकर पैसे कमाने के चक्कर में लगा रहता था। हालांकि उस समय अभी नया - नया उपन्यास भी पढ़ना शुरू कर दिया था। पहली उपन्यास मुझे गांव के मैनेजर तिवारी ने दिया था देश के क्रांतिकारियों के विषय में जानने के लिए उसका नाम था ‘ लालरेखा ’ और उसके लेखके हैं कुशवाहा कांत। यह उपन्यास तो दिल को छू लिया। उस समय सबसे ज्यादा गुलशन नंदा, कुशवाहा कांत, दिनेश ठाकुर, रीमा भारती जैसे लेखकों के उपन्यास पढ़ता था। खैर पहली बार हम तीनों मंकेश्वर भाई, बागेश्वर भाई और मैं घर से पैसा कमाने के लिए भागे, लेकिन जब शाम होने लगा तो हम तीनों एनएच - 28 के सामने  एक गांव जहां दोनों की रिश्तेदारी थी, वहां चले गए। जब पहुंचे तो करीब राते के साढ़े सात बज रहा था। जाते ही हम लोगों को खाने को मिला और बाहर की पलानी ( झोपड़ी ) हमारे लिए सोने को मिला। कुछ समय बाद तीनों गोपालगंज फिल्म देखने चल दिए वह भी पैदल। हमारे पास घड़ी नहीं था और बार - बार बागेश्वर भाई किसी घड़ी वाले से समय पूछ रहे थे। किसी तरह 9 से 12 का शो देखने हम तीनों टाॅकिज के अंदर चले गये, लेकिन तब तक फिल्म शुरू हो चुका था। हालांकि वह मेरा पहला फिल्म था और वे दोनों फिल्म देखने में मग्न हो गये और मैं मजे से हाॅल में सो गया। जब इन लोगों ने मुझे जगाया तब मेरी नींद खुली और हम वापस आये।

बाद में जब गाजियाबाद आया तो रात में उस समय अर्थला के ज्ञान चक्कीवाले के वीसीआर पर जगह  - जगह फिल्म दिखाई जाती थी और हम लोग रात - रात भर देखते थे। उसी समय एक फिल्म देखा था ‘जीने नहीं दूंगा ’ और शायद यह भी फिल्म  था - ‘ मरने नहीं दंूगा ’। लगता है आज कोराना वायरस से सर्वशक्तिमान भगवान भी पृथ्वी वासियों से नराज है तभी तो वह ऐसा कर रहे है कि उस फिल्म की आज याद ताजा हो गई ‘ जीने नहीं दूंगा।’ एक तरफ दुनिया और हमारा देश कोरोना से परेशान है । देश में 21 दिन का लाॅकडाउन है। गरीब, मजदूर, मेहनतकश, ठेली- पटरी, दिहाड़ी मजदूर सभी इस लाॅकडाउन से परेशान हैं। सामाजिक संस्थाएं और सरकार ऐसे लोगों को खिलाने के लिए कई तरह की उपाय कर रही है, वहीं भगवान ने आज शाम को दिल्ली - एनसीआर क्षेत्र में भूकंप का झटका दे दिया। उस समय सब घरों से बाहर निकल गये जान बचाने के लिए कोरोना का भय लोग भूल गए। कोरोना से बचाव घर के अंदर रह कर कर सकते है तो भूकंप से बचाव के लिए बाहर तो निकलना ही पड़ेगा। भगवान कह रहे है - सुधर जाओ नही ंतो जीने नहीं दूंगा। भाई लोग मैं तो सुधरने में लग जा रहा हूं, आप भी लग जाएं। राम - राम ! 


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