खुल्लम - खुला : जरा फासले से मिला करो Match the distance




                                                               संजय त्रिपाठी 

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से। ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो। ’ -  आज शायर बशीर बद्र का यह नब्ज यह दर्शाता है कि कवि बहुत ही दूरद्रष्टा भी होते थे। ‘ जहां न जाये रवि, वहां जाये कवि ’ यह तो पहले से ही जानते थे, लेकिन अब जाकर यह विश्वास हो गया कि कवि भविष्य की चिंता भी करते हैं। आज कोरोना के कारण जनता कफ्र्यू पूरे देश में लगा है। यह कफ्र्यू प्रशासन के आला अधिकारियों द्वारा किसी घटना या अनहोनी के मध्येनजर नहीं लगाया गया है, बल्कि देश के प्रधानमंत्री के अपील पर देश की जनता द्वारा स्वत: ही लगाई गई है। आज यह कफ्र्यू बिना दबाव का सफल रहा। लोग सुबह 7 बजे से ही अपने - अपने घरों से बाहर नहीं निकले है। पड़ोसी - से - पड़ोसी भी बात करने को तैयार नहीं था। चाहे इसे कोरोना का डर कहे या आम जन के विवेक का प्रयोग दोनों नजरिये से देखे तो सामाजिक दूरी के लिए यह सही कदम था। आज यह भी जानकारी सामने आया कि यूपी सरकार ने इस जनता कफ्र्यू की सीमा अवधि सुबह 6 बजे तक बढ़ा दी है। कोई बात नहीं यूपी की जनता इसका भी पालन करेगी। लेकिन जिस तरह कोरोना वायरस के संदिग्ध या पोजेटिव मरीज आइसोलेशन से भाग रहे हैं इसे देखते हुए ऐसा लगता है कि यह बायन वे अपने साथ - साथ पड़ोसी व अन्य लोगों को भी बिना बांटे मानेंगे नहीं। गाजियाबाद में कई मरीजो के इसी तरह भागने का मामला सामने आ रहा। यहां के डाॅक्टर भी ऐसे समय पर बीमारी का बहाना बना कर अस्पताल जाने को तैयार नहीं है। इस मामले में भी मुख्य चिकित्सा अधिकारी को रिपोर्ट लिखाने तक की धमकी देनी पड़ रही है। देश के 75 जिलों मेें लाॅकडाउन किया गया है उसमें गाजियाबाद भी है, यानी हर क्षेत्र में अव्वल । मुझे इस तरह की बीमारी को सुन कर और देख कर अपने गांव की एक घटना याद आती है जिसे बुजुर्गो ने बचपन में चर्चा के दौरान बताया। शायद यह घटना 1920 की है जब प्लैग को जोर चल रहा थां। मेरे गांव के उत्तर में एक माधोपुर गांव है जो प्लैग में पूरी तरह साफ हो गया था। आज भी इस गांव की जनसंख्या बहुत थोड़ी है। इसका कारण प्लैग बीमारी ही बताई जाती है। कहा जाता है कि उस समय प्लैग के शिकार हुए लोगों का क्रियाक्रम करने वाला भी कोई नहीं मिल रहा था। इसी तरह चेचक और बड़ी माता ( स्माल पाॅक्स ) की दहशत भी हम लोग देखें है। हमारे समय में स्कूल में चेचक का टीका लगा था, जिसका निशान आज भी लोगों के बाये हाथ में हल्का गड्ढ़ा सा दिखाई देता है। हालांकि जिस दिन मेरे स्कूल में यह टीका लगने आया था उस समय मैं चैथी कक्षा में पढ़ता था और इसके डर से बस्ता स्कूल में ही छोड़ कर स्कूल और गांव से बाहर भाग गया था। यही कारण है कि उस निशान से मैं आज तक बचा हुआ हूं। हालांकि आज से चार साल पूर्व मुझे छोटी माता निकली वह भी उस समय जब स्कूल के बच्चों व अध्यापकों के साथ नैनिताल स्कूल टूर पर गया था। जब माता के पीड़ा से पीड़ीत था, तब बार - बार यही दिमाग में आ रहा था कि अगर मैं स्कूल में टीका लगाने के दिन स्कूल छोड़ कर नहीं भागता तो आज इस बीमारी का शिकार नहीं होता। लेकिन आप सब भी याद करे जब बड़ी माता, चेचक या छोटी माता निकलती हैं तो उस व्यक्ति को उस समय भी समाज व परिवार से मेल - मिलाप खत्म कर दिया जाता है। उसे साफ - सफाई का ध्यान रखा जाता है, उसके कमरे में गंगाजल का छिड़काव कर नीम के पत्ते रखे जाते हैं। खुजली होने पर उसी पत्ते से शरीर को रगडा जाता है। आज भी पुराने लोगों के चेहरे व शरीर पर गोल - गोल छोटी - छोटी दाग के निशान दिखाई देते हैं जो बड़ी माता या चेचक बीमारी से कभी पीड़ित होने का गवाह है। आज कोरोना से बचाव के लिए भी वैसे ही जागरूकता की जरूरत है। आज शाम 5 बजे मेरा मुहल्ला पूरी तरह गुलजार हो गया। सभी मुहल्ले वाले अपने - अपने दरवाजे व बालकोनी से ताली, थाली, शंख, घंटा व अन्य सामान को बजाकर एक अलग ही माहौल बना दिया । प्रजा ने राजा के आदेश का पालन किया अब राजा की बारी है। बचो और बचाओ, दाल - रोटी खाओ - प्रभु के गुन गाओ । राम - राम जी। 


Share on Google Plus

0 comments:

Post a comment