खुल्लम - खुला : लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल ! I went to see redness, I also became red!






                                                                  संजय त्रिपाठी 

आज पूरा विश्व कोरोना वायरस के डर से व्याकुल है। कहीं कफ्र्यू तो कही लाॅकडाउन धोषित किया गया है। आम जनता परेशान है, सरकार हैरान है, नेता ज्ञानवान है, मजदूर - गरीब हालात से वियावान है, सोशल मीडियावाले ऐसे समय में दयावान है, एक - दूसरे की गलती गिनाने में सब मेहरवान हैं, भक्त और चमचों में इस घड़ी पर मौखिक युद्ध बलवान है। कोई मोदी को दोषी ठहरा रहा है तो कोई केजरीवाल को पानी पी - पी कर गाली दे रहा। कुछ सोशल मीडिया पर ऐसी खबरें आ रही है कि लाॅक डाउन में मजदूर - गरीबों के पलायन के पीछे सारा खेल केजरीवाल सरकार की है। सोशल मीडिया पर चींटी सा जमघट लगा है। किलस - किलस कर एक दूसरे को जी भर कर गाली दे रहे हैं। कहा भी गया है कि - खाली मस्तिष्क शैतान का घर । आखिर लाॅकडाउन के समय घर में खाली बैठकर करे तो क्या करे। शुक्र मनाइए कि 21 वीं सदी में विज्ञान ने कई ऐसी सुविधाएं दे दी जिसकी जरूरत आमने - सामने होने पर ही होता था, आज वह दूर से भी हो जा रहा। आज हम जिसे चाहे उसे घर में बैठे - बैठे धमका सकते हैं, गरिया सकते हैं, सर फोड़ने, गोली मारने से लेकर कुछ भी करने को कह सकते है। यह सब संभव हो रहा है नये मोबाइल फोन के युग में ही । क्या ऐसा समय पहले था ? कुछ तो ऐसे है कि आज भी ज्यादा गुस्सा होते हैं तो बचपन के तरह ही स्पष्ट शब्दों में मां - बहनों को सम्मानित कर देते हैं। खैर जो भी हो लेकिन लाॅकडाउन से लोगों को कम से कम कुछ दिन आराम करने का मौका तो मिला। बच्चे से बड़े सब अपने - अपने घरों में दुबके हुए हैं। सिर्फ गरीब - मजदूर ही खाली - पिले सड़क नाप रहा है। वह भी अकेला नहीं, अपने साथ बच्चे - गच्चे को भी ले रखा है। जहां मन थका वहीं आराम करने बैठ जाता । साथ में बोतल का पानी भी ले रखा है अपनी प्यास बुझाने के लिए। कल यह दृश्य देख कर ऐसा लगता था कि भगवान राम अपनी पत्नी सीता और भाई राम के साथ ऐसे ही बनों में भटकते फिरे होगें। रेलवे लाइन पर चल रहे पलायनवादियों को देख कर पंचवटी का दृश्य सामने आ जाता था जब पंचवटी को बनाने के लिए लकड़ी की गांठ ढोते दोनों भाई और सुंदरी सीता दिखती है। राम वनवास गमन चैपाई में तुलसीदास ने आमजन को व्यथित होकर माता - पिता को दोषी ठहराने की बात लिखते है। राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी ।। ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे ।। यहां भी इन गांव गमन करने वालों के लिए कोई न कोई दोषी तो है, जिसे सड़क पर चलते समय लोग इन्हें देखकर उसे कोस रहे थे। लेकिन इस लाॅकडाउन में आनन्द ही आनन्द नजर आ रहा है। अब जिसे ऐसे समय का आनन्द नहीं लेना तो उनका नसीब ही खराब कहा जायेगा। हालांकि जब लाॅकडाउन समाप्त होगा तो सरकार को पछतावा भी बहुत होगा। सबसे ज्यादा पछतावा स्वामी जी, भागवत जी, शास्त्री जी जैसे को ही होगा, क्योंकि जिस जनसंख्या नियंत्रण का वे कानून बनाने के लिए सरकार पर दबाव दे रहे हैं, वह लाॅकडाउन के नौ माह बाद विकराल रूप भी ले सकता है। उधर हमारे प्रधानमंत्री जी भी कह रहे हैं कि घरों में बैठकर परिवार के साथ समय बितायें। लोग समय तो बिता रहे हैं, लेकिन परिवार का आकार बढ़ता है तो इसका दोष उन्हें नहीं दिया जाएं। आज कबिर दास की एक दोहा याद आ गई जिसका उल्लेख करना उचित ही होगा । लाली मेर लाल की, जित देखूं तित लाल। लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाला।। फिर भी मैं यही कहूंगा कि संभल कर, बाद में यही सरकार दोष देगी। राम - राम जी।    


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