खुल्लम - खुला : नफरत की आग - 2 Fire of hate





                                                            संजय त्रिपाठी 
पिछले अंक में आपने नफरत की आग शीर्षक से खुल्लम - खुला पढ़ा था। इस बार भी व्यंगात्मक विचार के जगह ‘ नफरत की आग - 2 ’ आपके समक्ष रख रहे है। पिछली बार यह प्रश्न भी उठाया था कि नफरत क्या है ? यह कैसे पैदा होता है ? क्या यह एक दिन में पैदा हो जाता है ? जैसे तमाम प्रश्न और इसका उत्तर भी अपनी क्षमतानुसार दिया था। पिछले अंक में मुस्लिमों के तालिम और उनके कार्य - विचार का उल्लेख करते हुए यह भी दर्शाया था कि आज भी हिन्दू समाज के कुछ लोगों का मानना है कि मुस्लिम सिर्फ और सिर्फ काफिर तथा हिन्दुओं के खिलाफ जहर ही उगलते है। उनमें हर तरह से हिन्दुओं के खिलाफ नफरत ही भरा जाता है। लेकिन आज जो पूरे देश में हो रहा तथा दिल्ली हाल में ही जिसकी गवाह बनी है क्या वह नफरत की उपज नहीं है। आखिर यह नफरत आया कहां से ? जिस तरह से दिल्ली चुनाव के दौरान नेताओं के वक्तव्य सामने आये क्या वह नफरत को नहीं दर्शाता है। क्या कोई ऐसा नेता होगा जो समाज सेवा के लिए नेतागिरी में आया हो और एक समुदाय को गाली देता हो, उसे गोली मारने की बात करता हो तथा उसे विरोध प्रदर्शन या सरकार के खिलाफ आवाज उठाने को राजद्रोह या देश का गद्दार कहता हो। यह भी एक नफरत ही है जो आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद्, बजरंग दल जैसे संस्थाओं की देन रही है। जो काम मुस्लिमों के मदरसे, मस्जिद तथा मकतब में मुल्ला - मौलिवियों के द्वारा किया जाना कुछ अपने को जागरूक कहने वाले हिन्दू बताते हैं, क्या वहीं काम हिन्दुओं के इन संस्थाओं द्वारा नहीं किया जाता। अगर ऐसा नहीं होता तो आज हिन्दू और मुसलमान का रोना नहीं रोया जाता। यह भी दोनों समुदायों द्वारा सदियों से एक - दूसरे के खिलाफ फैलाई गई नफरत का ही नतीजा है। नफरत की राजनीति में हमेशा हिंसा ही पैदा होती है। इस हिंसा को रोका जा सकता है, लेकिन जिस नफरत से वह पनपती है उसके दाग कभी नहींे मिटते है। अदृश्य दर्द के घावों की तरह रह जाते हैं दशकों तक टूटे मकानों में, बर्बाद हुए बस्तियों और उनमें रहनेवालों के लोगों के अकल्पनीय दुख में, जिनका कोई बेटा, बाप या भाई बेमौत मारा गया हो सिर्फ नफरत के आग में। जरा सोचे यह नफरत तो सबसे ज्यादा भड़काया गया महाराष्ट्र और हरियाणा का चुनाव जितने के चक्कर में, जब गृहमंत्री बार - बार चुनावी भाषण के दौरान नागरिकता संशोधन कानून को हथियार बनाकर कह रहे थे कि किसी भी हिन्दू, सिख, इसाई, जैन, बौद्ध या पारसी को अपनी नागरिकता गंवाने की कोई चिंता नहीं होनी चाहिए। नाम अगर नहीं लिया तो सिर्फ देश के मुसलमानों का। ऐसे में मुसलमानों का इस कानून के खिलाफ विरोध होना स्वभाविक था। बाद में उनके नेता शाहीनबाग में महिलाओं के आंदोलन को गद्दारों का अड्डा सावित करने में लग गये। हालांकि दोनों तरफ ही नफरत की आग लगी हुई थी, जिसे भड़काने का काम किया कपिल मिश्रा का कानून के समर्थन में प्रदर्शन तथा तीन दिन का अल्टीमेटम। खैर, स्थितियों जो भी रही हो, लेकिन नफरत का परिणाम यह रहा कि दिल्ली की कई बस्तियां पूरी तरह बर्बाद हो गई हैं या उनमें नफरत का जहर इतना फैल गया है कि हिन्दुओं और मुसलमानों में दुबारा भाईचारा कायम करने में बहुत वक्त लगेगा। दंगे रूक जाते हैं हमेशा, लेकिन नफरत जब किसी शहर के हवा - पानी में घुल जाती है तो शहर के रगो में जहर बन कर रह जाती है।   


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