संपादकीय : मुझे भेड़ियों से बचाओ !




आज एक बार फिर पूरा देश हैदराबाद की एक और निर्भया के साथ दरिंदगी को लेकर उबाल पर है। बेटियां चीख रही हैं - मुझे भेड़ियों से बचाओ। हर 15 मिनट में देश में एक बच्ची हो रही बलात्कार की शिकार। आखिर इन मासूमों को कब सुरक्षा मिलेगा, यह प्रश्न अब भी समय के गर्व में है। हैदारबाद में सरकारी अस्पताल से घर लौट रही वेटरनरी डाॅक्टर के साथ गैंगरेप और जलाकर हत्या, राजकोट में एक आठ साल के मासूम के साथ बलात्कार की घटना, कोयंब्टूर में जन्मदिन मनाने गई एक 11 वीं की छात्रा के साथ 6 लोगों ने किया गैंगरेप और दिल्ली में एक 55 बर्षीय महिला के साथ बलात्कार के बाद हत्या की घटना दो दिन के अंदर अखबारों की सुर्खियां बनी है। यह वह घटनाएं हैं जो सामने आये हैं, लेकिन देश में दर्जनों ऐसी घटनाएं रोज हो रही है जो अखबारों व मीडिया की सुर्खियां नहीं बन पाती। इन घटनाओं ने आज एक बार फिर यह ज्वलंत प्रश्न हमारे सामने खड़ा कर दिया है कि देश में बेटियां सुरक्षित क्यों नहीं हैं। कल संसद गेट पर अनु दूबे का अकेला धरना अंतरआत्मा को झकझोर कर रख दिया। हालांकि पुलिस ने उसके आवाज को दबाने के लिए उसे जबरन हटाया लेकिन उसकी आवाज दूर तक पहुंच गई। एक अनु दूबे ने यह नहीं पूछा कि - मैं सेफ क्यों नहीं आज यह पूरे देश की लड़कियां पूछ रही है। अनु का यह प्रश्न सरकार और समाज से पूछा गया है कि - हैदराबाद में वह जली, कलम ैं भी जलूंगी, लेकिन मैं लड़ूंगी । सरकार से बस यह पूछना है कि यह खत्म कब होगा ? क्या सरकार और समाज उसके इस प्रश्न का उत्तर दे पायेगा। लोगों में इन घटनाओं से भारी आक्रोश है। हैदराबाद में लोगों ने थाना घेरा, पकड़े गये चारों दरिंदों को लोग तुरंत सजा की मांग कर रहे थे। पुलिस को लाठीचार्ज तक करनी पड़ी। यह एक दिन के आक्रोश का नतीजा नहीं, बल्कि रोज मासूमों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार से उबला लोगों का गुस्सा है। आखिर क्यों इंसान जानवर बनता जा रहा। इसमें समाज को भी कम दोषी नहीं माना जायेगा।  इन घटनाओं पर रोक लगाने के लिए सख्त से सख्त कानून बनाया जा रहा है, रोज सजा का एलान भी होता देखा जा रहा है, लेकिन घटनाएं कम होने के वजाय बढ़ती ही जा रही है। इसके पीछे के कारणों को भी ढूढ़ना होगा। हालांकि आज इस उफान के बीच उत्तर प्रदेश के बागपत से मिली खबर कुछ तो न्याय के प्रति उम्मीद जगाया है। कल बागपत जिला में 5 दिन में इंसाफ मिला और रेपिस्ट को उम्रकैद की सजा दी गई। लोगों में एक विश्वास जगा । फिर भी यह गौर करने की बात है कि हमारे देश का कानून लचर है, ये सब मानते है। अगर कानून सख्त हो तो शायद अपराधिक मामलों की संख्या बहुत कम हो जाती। कमजोर कानून और इंसाफ मिलने में देर भी बलात्कार की घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। देखा जाए तो प्रशासन और पुलिस कमजोर नही हैं, कमजोर है उनकी सोच और समस्या से लड़ने की उनकी इच्छा शक्ति।  पैसे वाले जब आरोपों के घेरे में आते हैं तो प्रशासनिक शिथिलताएं उन्हें कटघरे के बजाय बचाव के गलियारे में ले जाती हैं। पुलिस की लाठी बेबस पर जितने जुल्म ढाती है सक्षम के सामने वही लाठी सहारा बन जाती है। अब तक कई मामलों में कमजोर कानून से गलियां ढूंढ़कर अपराधी के बच निकलने के कई किस्से सामने आ चुके हैं। कई बार सबूत के आभाव में न्याय नहीं मिलता और अपराधी छूट जाता है।  अंततः आज हमें बलात्कार को धर्म, मजहब के चश्मे से नहीं देखना चाहिए. बलात्कारी कहीं भी हो सकते हैं, किसी भी चेहरे के पीछे, किसी भी बाने में, किसी भी तेवर में, किसी भी सीरत में। बलात्कार एक प्रवृति है। उसे चिन्हित करने, रोकने और उससे निपटने की दिशा में यदि हम सब एकमत होकर काम करें तो संभवतः इस प्रवृत्ति का नाश कर सकते है।   
संजय त्रिपाठी   


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