खुल्लम - खुल्ला : जय बजरंग बली, तोड़ दुश्मन की नली ! Jai Bajrang Bali, break the enemy's hose!



                                                               खुल्लम - खुल्ला

धन्य हैं हमारे देश के नेता और धन्य है उनकी बौद्धिक विचार। अब तक भारत हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख और इसाई चार धर्मो में बंटा हुआ था। धीरे - धीर हमारे देश के नेता हिन्दू धर्म को जातियों व स्वर्ण - दलित में बांटा। अब देवताओं को भी जातियों में बांटने लगे है। अभी मध्यप्रदेश चुनाव में संत मुख्यमंत्री ने हनुमान को दलित बता दिया। हंगमा मचा पड़ा है। कोई कह रहा है कि जो देवताओं को राजनीति में खींच रहे है, नाराज हनुमान जी उसको जरूर सबक देंगे। तो कोई तर्क दे रहा हनुमान जी को दलित कहने पीछे मुख्य उद्धेश्य उनके राम के प्रति समर्पण को दिया जाता है। तुलसीदास जी भी सुंदर कांण्ड में लिखते हैं कि - ‘‘ प्रातः लेई जो नाम हमारा, तेही दिन ताहि न मिले अहारा।’’ हनुमान जी तो बंदर कुल के है और उन्होंने तो अपने नाम लेने पर आहार न मिलने की बात भी की है, ऐसे में जो इन्हें दलित बता रहे है, उनका पार कैसे लगेगा? कुछ भी हो चुनाव के दौरान चैनल वालों को मजा आ जाता है। हर नेता अपने से लंबा फेकता है और ये चैनल वाले अपने पहले से सेेट विचारकों को स्टूडियों में बिठा कर लग जाते है फेंके हुए को लपेटने। आज कल हर चैनल के स्टूडियों में हनुमान जी दलित है या नहीं इसे मुद्दे को लपेटा जा रहा है। जनेव, गौत्र, दादा - दादी, बाप - मां से शुरू हुआ चुनावी राजनीति राहुल गांधी के दातात्रेय कौल पर आकर टीका हुआ है। अब सिर्फ बचपन में हम लोग खेलते समय अपना दाव नहीं मिलने पर मां - बहन को जो सुंदर - सुंदर शब्दों से ताज पोशी करते थे, अब इन नेताओं से भी सिर्फ वे सुंदर - सुंदर शब्द ही सुनने बाकी है। लगता है एक दशक बाद वह भी शुरू हो जायेगा। जो जनता वोट देती है उससे संबंधित विकास व अन्य मुद्दे कहां गायब हो गये जो ढूढे भी नहीं मिल रहा। किसान परेशान है, रोज सड़क पर उतर रहे हैं, कभी अपना पेशाब पी रहे है, कभी नंगा इस ठंढी में चिल्ला रहे है, कभी अपने जैसे आत्महत्या करने वाले किसान साथियों के हड्डियों को लेकर दिल्ली की चैराहों पर भीख मांग रहे है, लेकिन इन बेशर्म नेताओं को जरा भी शर्म नहीं आता। अन्नदाता मरने को मजबूर है और ये लोग एक दूसरे के मां - बहन करने पर भीड़े हुए है। ऐसे में नाना पाटेकर की फिल्म प्रतिघात याद आती है जिसमें इन नेताओं के पैतरों पर गाया है - ‘मेरे बलमा बेईमान हमें पटियाने आया है, वोट हथियाने आया है ।’ यह जो कुछ हो रहा है इसमें सिर्फ देश के वोटरों के लिए ‘ उन्हीं की जूता, उन्हीं के सर’ दिखाई दे रही है। चुनाव आयोग कहता है कि सभी घर से निकलों और वोट दो । जनता निकल भी रही है, वोट भी दे रही है, लेकिन उन्हें मिलता क्या है? एक हमारे साथी कह रहे हैं- हद हो गई देश के नेताओं के एक - दूसरे पर आरोप लगाने की। कोई भी घोषणा पत्र का रैली या मीटिंग में जिक्र नहीं कर रहा सिर्फ राम - हनुमान, हिन्दू - मुस्लिम, जनेव - गौत्र की ही बाते चल रहा है। विकास तो चार साल में पैदा ही नहीं हुआ, लगता है अगला पांच वर्ष भी पैदा होने में खींच लेगा। इधर गाजियाबाद में व्यापार मंडल के कार्यकर्ताओं ने घंटाघर हनुमान मंदिर में पूजा -पाठ कर देश के नेताओं को सद्बुद्धि देने की मांग की है, जिससे ये देवताओं को राजनीति में ना खींचे। बजरंगबली जी की जाति देखने वाले एक बार उनकी ताकत को भी तो देख लो। जय बजरंगबली..........! तोड़ दुश्मन की नली। 
संजय त्रिपाठी 



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